जो कुछ लोग सेवाभाव से जुटे हैं उनको बदनाम करके क्या मिलेगा?

श्रीकांत पाराशर
समूह संपादक, द.भा.रा.

किसको पता था कि एक दिन हम सबको इस तरह के कोरोना संकट से लोहा लेना होगा। यह बिल्कुल अप्रत्याशित संकट है। प्राकृतिक आपदा से भी भयानक। प्रकृति किसी एक क्षेत्र में अपना प्रकोप कुछ समय के लिए दिखाती है और फिर शांत हो जाती है। उससे निपटने में वे लोग मददगार साबित होते हैं, जो अप्रभावित होते हैं। सरकारें, प्रशासन, पुलिस,जनता सब सहयोगी बनकर पीड़ितों की मदद करते हैं और संकट से बाहर निकलना थोड़ा आसान हो जाता है। लेकिन इस बार, पहली बार एक अजूबा संकट कहर बनकर पूरे विश्व पर टूट पड़ा है तो भारत कैसे बच सकता था? हम भी चपेटे में आए हैं। भारत में भी कोरोना अपना कहर ढा रहा है।

केन्द्र सरकार के नेतृत्व में विभिन्न राज्यों की राज्य सरकारें भी अब संकट की गंभीरता को समझ कर सहयोग करने लगी हैं। सब ठीक ठाक था, 24 मार्च से घोषित लाकडाउन प्रभाव छोड़ रहा था। खतरे के बादल अभी छंटे भी नहीं थे कि आग में घी का काम किया तब्लीगी जमात के लोगों ने। उन्होंने कोरोना पीड़ितों की संख्या में जो इजाफा किया है उससे संख्या आसमान छूने को बेताब दिखाई दे रही है। यह मनगढ़ंत बात नहीं, बल्कि सरकारी आंकड़े यह बताते हैं कि निजामुद्दीन में तब्लीगी जमात के मरकस में एकत्र लोगों ने देशभर में तेजी से कोरोना संक्रमण फैलाया।

इन हालात में बाकी पहलुओं पर अभी चर्चा करना प्रासंगिक नहीं है इसलिए यहां मैं कोरोना के कारण हुए लाकडाउन के दौरान परेशानियों से निपटने में जो राजस्थानी समुदाय, मारवाड़ी जैन समाज, अन्य उत्तरभारतीय तथा अन्य प्रवासियों के सामाजिक संगठन काम कर रहे हैं तथा इस संकट की घड़ी में जरूरतमंदों को भोजन, राशन, मास्क, सैनीटाइजर आदि निशुल्क वितरित कर रहे हैं, उनके प्रयासों का जिक्र करते हुए उनकी कोशिशों की तहेदिल से सराहना करता हूं। ऐसे भयावह संकट में सरकारें अकेली कभी नहीं लड़ सकतीं, सामाजिक संगठनों और उदारमना दानदाताओं का इसमें बहुमूल्य सहयोग होता है। इस समय भी यही हो रहा है। दो बड़े संगठन बड़े स्तर पर भोजन वितरण कर रहे हैं, एक है जीतो और दूसरा गोड़वाड़ जैन भवन ट्रस्ट।

जीतो सुबह और शाम 17-17 हजार पैकेट वितरित कर रहा है तो गोड़वाड़ भवन एक समय यानी दोपहर को 15 हजार लोगों तक यह भोजन पैकेट प्रतिदिन पहुंचा रहा है। यह सभी पैकेट बीबीएमपी अधिकारियों, कर्मचारियों, सांसदों, विधायकों, पार्षदों, पुलिस विभाग आदि के दिशानिर्देशों, सहयोग तथा मैनफोर्स के साथ वितरित हो रहे हैं। इनमें गड़बड़ी की संभावनाएं लगभग नगण्य हैं। फिर भी अपवाद के तौर पर इक्का दुक्का लापरवाही की घटना हो सकती है क्योंकि कभी कभी किसी छोटे संगठन या समूह या किसी पहचान के व्यक्ति के आग्रह पर उसे वितरण के लिए कुछ पैकेट दिए गए हों और वह काम ठीक से न कर पाया हो, ऐसे में पैकेट सही हाथों तक न पहुंचे हों यह संभव है। कोई भी बड़ा संगठन जब अपनी इच्छा से सेवाकार्य हाथ में लेता है तो उसकी मंशा पर शक नहीं किया जा सकता।

इन संगठनों को किसी ने बाध्य नहीं किया कि वे भोजन वितरण करें बल्कि स्वेच्छा से ये सेवा करने आगे आए। ऐसे में इनकी सेवा की सराहना करने के बजाय अगर इन पर अंगुली उठाई जाए और इन्हें हतोत्साहित किया जाए तो उन कार्यकर्ताओं तथा उन दानदाताओं पर क्या गुजरती होगी जो इस काम से जुड़े हैं। कल कुछ ऐसा ही हुआ। इन दो संगठनों के अलावा भी अनेक प्रतिष्ठित छोटी बड़ी संस्थाएं तन्मयता से सेवाकार्य में लगी हैं। उन पर शक करने या उनकी बुराई करने का कैई कारण नहीं है।

कल एक वीडियो वायरल किया गया जिसमें एक बड़ी संस्था का नाम लेकर उसके नाम से बांटे जाने वाले भोजन पैकेट के भोजन की क्वालिटी पर सवाल उठाए गए और साथ ही यह आरोप भी लगाया गया कि वितरण सही नहीं होने से भारी संख्या में पैकेट सड़कों पर जहां-तहां बिखरे पड़े हैं। इस वीडियो में यह दिखाई देता है कि पैकेट बिखरे पड़े हैं परंतु खराब क्वालिटी के भोजन पैकेट उसी संस्था विशेष के हैं, यह साबित नहीं होता क्योंकि सब पैकेट खुले हुए हैं और उनको किसी भी संस्था का बताकर उस संस्था का नाम बदनाम किया जा सकता है। इसलिए निश्चित रूप से वीडियो वायरल करने के पीछे एक संस्था को बदनाम करने की सोच रही होगी, यह प्रथमदृष्टया लगता है। हां, यह सही है कि भोजन अगर अच्छा होगा तो लोग सड़कों पर क्यों फैंकेंगे परंतु वह घटिया क्वालिटी का भोजन किसने सप्लाई किया यह बिना पुख्ता जानकारी के किसी संगठन के माथे आरोप मढ देना कहां तक न्यायोचित है?

जीतो हो या गोड़वाड़ भवन, बड़े बड़े नेताओं ने इन संगठनों के भोजन किचन तथा पैकिंग आदि का अचानक पहुंच कर अवलोकन किया है तथा काम की सराहना की है। इनमें से कुछ ने स्वयं ने भोजन चखा है और अच्छा बताया है। इसलिए ऐसे प्रतिष्ठित संगठनों में से किसी को बदनाम करने की साजिश नहीं होनी चाहिए। विशेष रूप से, समाज के ही चंद लोगों को तो कतई ऐसा नहीं करना चाहिए। समाज के सभी अग्रणी संगठनों से जुड़े प्रमुख लोगों को सब जानते हैं। अगर भोजन में कोई खामी या वितरण व्यवस्था में कुछ अनियमितता दिखाई दी या भविष्य में भी दिखाई दे तो संबंधित व्यक्तियों से सम्पर्क साधना चाहिए। अगर उचित रेस्पॉन्स न मिले, कोई आपकी बात को अनसुना कर दे तब जाकर वैकल्पिक रास्तों का उपयोग किया जाता है। ऐसा थोड़े ही है कि आपको कुछ अच्छा नहीं लगा, या किसी के काम और नाम से ईर्ष्या हुई और आपने उसकी इज्ज़त को मिट्टी में मिलाने के लिए बिना आगा पीछा सोचे सोशल मीडिया का उपयोग कर लिया। यह मनोवृत्ति ठीक नहीं है।

जिन्होंने वीडियो वायरल किया उनकी ठीक से निंदा होनी चाहिए। सोचने की जरूरत है कि संगठनों में कार्यकर्ताओं का हौसला बढाने के लिए समाज के कितने उदारमना लोगों का आर्थिक योगदान शामिल होता है। कार्यकर्ता भी इस समय अपने स्वास्थ्य की परवाह किए बगैर समय और श्रम दे रहे हैं। इसलिए उनका हौसला पस्त हो, ऐसा काम किसी को नहीं करना चाहिए। विशेषरूप से उन लोगों को तो बिल्कुल नहीं, जो इसी समाज या समुदाय का अंग हैं। किसी कुटुंब के बहुत सारे सदस्यों में से अगर किसी एक से किसी दूसरे को कोई शिकायत है तो वह पहले घर में ही उस बात को उठाएगा। अगर घर वाले नहीं सुनें तो फिर वह पंचायत में जाएगा।घर की हर छोटी बड़ी शिकायत पंचायत में लेकर जाने का कभी कोई प्रचलन नहीं देखा गया। इसलिए जिन्होंने भी यह हरकत की, उन्हें अपनी इस गलती का अहसास होना चाहिए, या अहसास उन्हें कराना चाहिए अन्यथा इसका विपरीत असर आगे चलकर सब संगठनों पर पड़ेगा।

अब दूसरी बात करते हैं। मैंने कई दिन पहले ही संकेत दे दिए थे कि कुछ गड़बड़ियां हो रही हैं और यह कौन कर रहा है या कौन कर सकता है, इस पर गौर किए बिना ही समाज के दानदाता इन स्वयंभू सामाजिक कार्यकर्ताओं को अपना आर्थिक सहयोग देते रहे। मैं यह नहीं कहता कि छोटे या मध्यम स्तर के सामाजिक संगठन ठीक से काम नहीं कर सकते। अनेक प्रदेशों के, अनेक समुदायों के, अनेक व्यावसायिक संगठन अपने अपने स्तर पर कर्मठ कार्यकर्ताओं के सहयोग से संतोषजनक कार्य कर रहे हैं और इनसे जुड़े सदस्य अपने संगठनों के काम से संतुष्ट भी हैं। लेकिन कुछ व्यक्ति और कुछ संगठन बिल्कुल बरसाती मेंढक की तरह, जब भी कोई आपदा आती है तो तुरंत सक्रिय हो जाते हैं। इनको वे दानदाता पता होते हैं जो आसानी से इनकी चिकनी चुपड़ी बातों में आ जाते हैं। बस, गड़बड़ यहीं से शुरू होती है।

इस भोजन वितरण मामले में भी ऐसा हुआ है। कुछ लोगों ने अपने परिचितों से दान तो ले लिया परंतु इनके पास न तो कार्यकर्ता हैं और न ढांचागत व्यवस्थाएं। ऐसे लोगों ने मामूली खर्च पर यहां वहां से पैकेट बनवा लिए, जो खाने योग्य नहीं रहे होंगे। कुछ फोटो खींचकर दानदाताओं को और अपने ग्रुप्स में वाट्सएप पर लोड कर दिए होंगे ताकि दानदाता प्रसन्न रहें। ऐसे कई कथित समाजसेवी हैं जिनको अब पहचानने की जरूरत है और इनको प्रोत्साहन देने से बचने की आवश्यकता है। इनकी दुकानें बंद नहीं होंगी तो प्रतिष्ठित संगठनों की प्रतिष्ठा पर बन आएगी।

आज गोड़वाड़ भवन बिना किसी से दान लिए, अपने ही समाज के दानवीर रांका समूह के दिनेश रांका के आर्थिक सहयोग से रोज एक वक्त में 15 हजार भोजन पैकेट जरूरतमंदों को बांट रहा है। इस व्यवस्था का नेतृत्व महामंत्री कुमारपाल सिसोदिया कर रहे हैं। इसी प्रकार जीतो रोज 34 हजार पैकेट वितरित कर रहा है, बड़ा काम है, जिसकी सब सराहना कर रहे हैं। ऐसे में सबको उनका उत्साहवर्धन करना चाहिए। कहने का तात्पर्य यह है कि आप काम और कार्यकर्ताओं को पहचानें। दानदेते वक्त भी जरा सजग रहें।