जनता की सहानुभूति खोता ‘किसान आंदोलन’

फोटो स्रोतः यूएनआई ट्विटर
फोटो स्रोतः यूएनआई ट्विटर

गणतंत्र दिवस जैसे पावन अवसर पर दिल्ली में हुड़दंगियों के उत्पात के बाद ‘किसान आंदोलन’ आम लोगों की सहानुभूति खोता जा रहा है। किसानों के हित की आवाज बुलंद करने के नाम पर बेकाबू भीड़ ने जिस तरह लालकिले पर तिरंगे का अपमान किया, वह अक्षम्य है। यह सीधे-सीधे राष्ट्र के सम्मान, संप्रभुता को चुनौती है।

26 जनवरी की घटना के बाद सोशल मीडिया पर आ रहीं तस्वीरें इन प्रदर्शनकारियों की मंशा पर कई सवाल खड़े करती हैं।। एक वीडियो में तो कुछ लोग राष्ट्रीय ध्वज का अपमान करते दिखे। जब चौतरफा निंदा होने लगी तो उसी दिन इन प्रदर्शनकारियों के रहनुमान खुद को पीड़ित और शहीद की तरह पेश करने लगे।

सवाल है, जब शांतिपूर्ण रैली की इजाजत थी तो मामला अचानक काबू से बाहर क्यों हुआ? माना कि आंदोलनों में कई बार कुछ उत्साही लोग ऐसा कदम उठा लेते हैं जो योजना का हिस्सा नहीं होता है, लेकिन वायरल वीडियो में जिस तरह पुलिसकर्मियों की पिटाई की जा रही है, तेज गति से ट्रैक्टर दौड़ाए जा रहे हैं, उससे यह शक और गहरा होता है कि ‘आंदोलन’ के असल मकसद कुछ और हैं।

तिरंगे के अपमान जैसी घटनाएं अति-उत्साह का परिणाम नहीं हैं। देश में आंदोलन पहले भी हुए हैं। तब भी लोगों ने तिरंगा थामकर तत्कालीन सरकारों के खिलाफ आंदोलन का बिगुल बजाया है, पर गणतंत्र दिवस पर जिस तरह तिरंगे की मान-मर्यादा को ठेस पहुंचाई गई, उससे यह साफ नजर आता है कि ऐसे हुड़दंगियों की तिरंगे के प्रति न कोई आस्था है और न किसानों के लिए कोई हमदर्दी।

लोकतंत्र में अपनी राय रखने, शांतिपूर्ण ढंग से आंदोलन करने का अधिकार है। आखिर, हम आंदोलन, विचार और संवाद से ही गणतंत्र बने हैं। किसानों को अपनी बात देश के सामने रखने, कृषि कानूनों में त्रुटियां निकालने का अधिकार कोई नहीं छीन रहा है।

जिस तरह ट्रैक्टर रैली के नाम पर उत्पाती तत्वों की मनमानी सामने आई, उसके बाद यही कहा जा सकता है कि अगर किसान नेताओं को सच में किसान हितों के लिए आंदोलन करना था तो उन्हें अपने ‘लोगों’ पर काबू रखना चाहिए था।

सोशल मीडिया के जमाने में आंदोलन के नाम पर लोगों को इकट्ठा करना कोई बहुत मुश्किल काम नहीं रह गया है। हम सीएए विरोध के दौरान ऐसा देख चुके हैं। असल बात है प्रदर्शनकारियों को काबू में रख पाना।

जब ‘किसान नेता’ जोशीले भाषण देकर तालियां लूट रहे थे तो उन्हें लगा होगा कि रैली के दौरान ये लोग किसी अनुशासित सिपाही की तरह कदमताल करते हुए जाएंगे जिसका संदेश भारत सहित दुनियाभर में प्रसारित होगा। यह ख्याल भी रहा होगा कि इस रैली की तुलना सशस्त्र बलों की परेड से होगी।

चर्चा तो यह भी है कि कृषि कानूनों को लेकर केंद्र सरकार द्वारा अब तक नरम रवैया अपनाए जाने, किसानों से वार्ता की पहल करने के बाद अगर इन्हें निरस्त कर दिया जाता है, तो बात यहीं खत्म नहीं होगी। फिर यही फाॅर्मूला सीएए विरोध में अपनाया जाएगा। सरकार पर दबाव डाला जाएगा कि अगर कृषि कानून हटाए जा सकते हैं तो सीएए क्यों नहीं हटाया जा सकता?

अगर सीएए हटा दिया तो फिर जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद-370 बहाल करने का दबाव डाला जाएगा! यानी गाड़ी उलटी दिशा में ले जाने की पूरी रणनीति, जिसके बाद केंद्र पर यह ठीकरा फोड़ा जाएगा कि इन्हें काम करना नहीं आता, ये देश के मिजाज को नहीं समझते, ये अदूरदर्शी व अयोग्य हैं!

लालकिले पर तिरंगे के अपमान की घटना पर देशभर में लोग आपत्ति जता रहे हैं। वहीं, गुरुवार को सिंधु बाॅर्डर पर स्थानीय लोगों ने विरोध प्रदर्शन किया। उन्होंने मांग की कि इतने लंबे समय से यह इलाका सियासी अखाड़ा बना हुआ है, आवाजाही में दिक्कत हो रही है, लिहाजा इसे तुरंत खाली कराया जाए।

इन लोगों ने हाथों में तिरंगा थाम रखा था और नारे लगा रहे थे, ‘तिरंगे का यह अपमान, नहीं सहेगा हिंदुस्तान’, ‘सिंधु बाॅर्डर खाली करो’। राष्ट्रीय राजधानी की सुरक्षा में लगे केंद्रीय बलों के लिए यह समय बहुत चुनौतीपूर्ण है। अगर स्थानीय लोग आपा खोकर मैदान में उतरे तो बड़ा टकराव हो सकता है, जो किसी सूरत में देशहित में नहीं होगा।

किसान नेताओं को भी चाहिए कि वे संयम से काम लें। उत्तेजक वातावरण बनाने से बचें। जिन लोगों ने 26 जनवरी को उत्पात मचाया, उन्हें फौरन कानून के हवाले करें। जिद और अड़ियल रवैया छोड़ें, सरकार से बात कर सौहार्दपूर्ण माहौल में रास्ता निकालें। यूं अव्यवस्था फैलाने से लोगों की रही-सही सहानुभूति भी समाप्त हो जाएगी।