ग्रेटा से लेकर मिया खलीफा तक किसान आंदोलन में क्यों कूद रहे विदेशी?

दक्षिण भारत राष्ट्रमत में प्रकाशित संपादकीय
दक्षिण भारत राष्ट्रमत में प्रकाशित संपादकीय

किसान आंदोलन के नाम पर अब कुछ विदेशी भी मैदान में कूद पड़े हैं। इसी बहाने नाम चमकाने का मौका मिलेगा, अखबारों में फोटो छपेगी और ट्विटर ट्रेंड में आएंगे सो अलग! जो पहले से ही घोषित सेलेब्रिटी हैं, उन पर पक्की मुहर लग जाएगी कि ये तो सच्चे हैं; देखिए, कहां पराई पंचायती में अपना पांव फंसा रहे हैं। जो अब तक गुमनाम थे, उनका भी कल्याण हो जाएगा। वे सेलेब्रिटी बनने की पहली सीढ़ी तो पार कर ही लेंगे, चाहे उन्हें यह तक मालूम नहीं हो कि आलू जमीन के अंदर होते हैं या बाहर!

अमेरिकी पॉप गायिका रिहाना, स्वीडन की जलवायु कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग, हॉलीवुड अभिनेत्री अमांडा केरनी, गायक जे सीन, डॉ. जियस, वयस्क फिल्मों की कलाकार मिया खलीफा के बाद अब अमेरिकी उपराष्ट्रपति कमला हैरिस की भांजी मीना हैरिस भारत को खेती-किसानी के मुद्दों पर नसीहत दे रही हैं।

ये सभी स्वनाम धन्य ‘क्रांतिकारी’ जानते भी हैं कि भारत में कितने मौसम होते हैं, कहां कब मानसून आता है, किसान की ज़िंदगी कैसी है, फसलों की बुआई-कटाई कैसे होती है, खलिहान से लेकर मंडी तक किसान को किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है? इन्होंने सोशल मीडिया पर हैशटैग देखा और कूद पड़े क्रांति करने!

इसके जवाब में लता मंगेशकर, सचिन तेंदुलकर, अक्षय कुमार सहित विभिन्न क्षेत्र के नामी लोगों द्वारा प्रतिक्रिया देना उचित ही है। हम एक राष्ट्र के रूप में हमारे मुद्दों को सुलझाने में सक्षम हैं। हमें आपके ‘मार्गदर्शन’ की कोई जरूरत नहीं है।

भारत एक लोकतंत्र है। यहां हमें कानून के दायरे में रहते हुए आंदोलन का अधिकार है। देश में उच्चतम न्यायालय है जो किसी भी कानून को सही ठहराने या रद्द करने की पूरी शक्ति रखता है। क्या अब हमें मिया खलीफा से सीखना होगा कि भारत में किसानों के क्या अधिकार होने चाहिए?

हमारा स्पष्ट मत है कि अगर कृषि कानून 100 प्रतिशत सही हैं तो भी किसानों को असहमत होने का पूरा अधिकार है। यह किसानों के अधिकार छीनने का मामला नहीं है जैसा कि ये ‘सेलेब्रिटी’ दावा कर रहे हैं। अगर किसानो को एक बिंदु पर भी आपत्ति है तो सरकार उसे सुने, आवश्यक कदम उठाए और यह सब सौहार्दपूर्ण माहौल में हो। हम किसी को यह अधिकार नहीं देते कि वह अमेरिका, कनाडा, नॉर्वे में बैठकर हमारे मुद्दों पर अपनी सियासी रोटियां सेके।

ड्राइंगरूम वाले ये विदेशी ​’बुद्धिजीवी’ उस समय भी अचानक सक्रिय हो गए थे जब भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निष्प्रभावी कर दिया था, लेकिन देश इस फैसले के साथ मजबूती से डटा रहा। फिर सीएए के समय ये एक बार फिर प्रकट हुए और ऐसा माहौल बनाने की कोशिश की कि मानो मोदी सरकार करोड़ों लोगों की नागरिकता छीन रही है, जबकि इस कानून का संबंध भारत के किसी नागरिक से था ही नहीं। यह नागरिकता देने का कानून है, लेने का नहीं।

भारत में सोशल मीडिया पर वायरल पोस्ट को ही अंतिम सत्य मानने वाले कुछ ‘बुद्धिजीवी’ उनके सुर में सुर मिलाने लगे और यह संदेश देने की कोशिश की कि यहां के नागरिकों को गिरफ्तार कर कैंपों में डाला जा रहा है। उनके बौद्धिक स्तर का इसी से पता चलता है कि सीएए आने से किसी की नागरिकता नहीं गई और न जाएगी। भारत तो अपने पड़ोसी देशों में सताए हुए उन अल्पसंख्यकों के लिए दरवाजे खोल रहा था जिनके लिए वह पहली और आखिरी उम्मीद है। क्या ये पश्चिमी ‘बुद्धिजीवी’ उन्हें अपने देशों में शरण देंगे?

भारत सदैव ऐसी शक्तियों के निशाने पर रहा है जो यह चाहती हैं कि वह अपने सामर्थ्य का पूर्ण उपयोग नहीं कर पाए, वह आगे नहीं बढ़ पाए, क्योंकि अगर भारत अपने सामर्थ्य का पूर्ण सदुपयोग करने में सफल हो जाएगा तो आर्थिक मोर्चे पर सर्वोच्च स्थान पर होगा। चूंकि भारत के विशाल भूभाग, बड़ा बाजार, प्रतिभावान युवा और ऐसी तमाम विशेषताएं हैं जो इसे दुनिया का सबसे संपन्न एवं शक्तिशाली राष्ट्र बना सकती हैं।

पश्चिमी मीडिया भारत की छवि खराब करने में कोई कसर नहीं छोड़ता। कई विदेशी एनजीओ यहां सेवा की आड़ में अपना गुप्त एजेंडा आगे बढ़ा रहे होते हैं। भारत में जब भी कोई बड़ा फैसला लिया जाता है तो ये फौरन अपनी असल भूमिका में आ जाते हैं। मई 1998 में जब राजस्थान के पोखरण में परमाणु परीक्षण किए गए तो पश्चिमी मीडिया की रुचि ऐसे लोगों को खोजने में थी जो इसका विरोध करें। हालांकि, उन्हें इस मामले में निराशा ही हाथ लगी क्योंकि देशवासियों ने इसका भरपूर समर्थन किया।

इन शक्तियों का गुप्त एजेंडा यह है कि भारत गरीब रहे, असुरक्षित रहे, आत्मनिर्भर न बने, मदद के लिए उनका मोहताज रहे, बड़े फैसले नहीं ले, फैसलों की गति धीमी हो, भ्रष्टाचार हो, जनता त्रस्त हो, ताकि ये आकर हमें सिखा सकें कि देश कैसे चलाया जाता है। दुर्भाग्य से आज कई लोग जाने-अनजाने ऐसी शक्तियों का मोहरा बने हुए हैं। वे उनके ट्वीट से हर्षित हो रहे हैं। क्या ये लोग हमारी समस्याएं सुलझाएंगे?

किसान आंदोलन हमारा अपना मसला है। हमें विवेकसम्मत तरीके से इसे हल करना चाहिए। ये विदेशी बौद्धिक सिर्फ प्रचार पाने की भूख में अनर्गल बयान दे रहे हैं जिन्हें गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है।