बांग्लादेश का इंसाफ: एक-एक कर फंदे पर लटकाए जा रहे नरसंहार, आतंकवाद के गुनहगार

प्रतीकात्मक चित्र। स्रोत: pexels
प्रतीकात्मक चित्र। स्रोत: pexels

बांग्लादेश की एक अदालत द्वारा लिया गया फैसला निश्चित रूप से इस पड़ोसी देश में कट्टरपंथ को हतोत्साहित कर लेखन और अभिव्यक्ति की आज़ादी को मजबूत करेगा। ढाका स्थित आतंकवादरोधी न्यायाधिकरण के जज ने जब यह फैसला सुनाया कि लेखक अविजित रॉय के हत्यारे पांच कट्टरपंथियों को फांसी पर लटकाया जाए, तो दुनियाभर में इसकी चर्चा हुई। एक दोषी को उम्रकैद सुनाई गई है। इससे पहले भी कई मौकों पर बांग्लादेश की अदालतों ने आतंकवाद और कट्टरपंथ के मामलों में सराहनीय फैसले दिए हैं।

साल 1971 के नरसंहार के दोषियों के प्रति बांग्लादेश का रुख बहुत ज्यादा सख्त रहा है। वह ऐसे कई दोषियों को फांसी दे चुका है जिन्होंने उस समय पाकिस्तान का साथ देते हुए अल्पसंख्यक हिंदुओं की हत्याएं कीं, उनकी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया। इन गुनहगारों की पकड़ अब तक जारी है। बांग्लादेश में कट्टरपंथ का इतिहास रहा है। उसके समानांतर साहित्यिक, सांस्कृतिक संबंधों को बढ़ावा देने वाले बुद्धिजीवी भी सक्रिय रहे हैं।

इस पड़ोसी देश में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो भारत आकर उस मिट्टी को चूमना चाहते हैं जिन पर कभी रामकृष्ण परमहंस, रवींद्रनाथ टैगोर, महर्षि अरविंद जैसे महापुरुषों ने कदम रखे थे। वहीं, साल 1971 में इसके अस्तित्व में आने के साथ ही यहां आईएसआई सक्रिय हो गई और पाकिस्तान अपने नापाक मंसूबों में जुट गया। इसलिए जब-तब आतंकी घटनाएं होती रहती हैं। साथ ही अल्पसंख्यक हिंदुओं, सेकुलर लेखकों को खासतौर से निशाना बनाया जाता है।

अविजित रॉय की हत्या का यह मामला फरवरी 2015 में बहुत सुर्खियों में रहा था। इसकी वजह से देश-विदेश के मानवाधिकार संगठनों ने बांग्लादेश सरकार को आड़े हा​थों लिया था। अविजित रॉय ब्लॉगर थे। वे कट्टरपंथ, धर्मांधता के खिलाफ लिखते रहते थे, इसलिए कई कट्टरपंथी बौखलाए हुए थे। इसके बाद अलकायदा से प्रभावित एक स्थानीय आतंकी संगठन अंसार उल्लाह बांग्ला ने इस हत्याकांड को अंजाम देने की साजिश रची। अविजित रॉय और उनकी पत्नी रफीदा अहमद को उस वक्त निशाना बनाया गया जब वे ढाका में एक पुस्तक मेले में शिरकत के बाद घर लौट रहे थे। हमले में अविजित ने दम तोड़ दिया, जबकि रफीदा की अंगुली कट गई।

पिछले दशक में बांग्लादेश ऐसे कई लेखकों की हत्या के लिए चर्चा में रहा है जिन्होंने कट्टरपंथ को चुनौती दी थी। ज्यादातर की हत्या चाकू से गला काटकर की गई, जैसे हाल में यूरोप में घटनाएं देखने में आई हैं। अगर अंसार उल्लाह बांग्ला की ही बात करें तो इस पर दर्जनभर लेखकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं की हत्या का आरोप है।

इससे पहले, एक और चर्चित मामले में बांग्लादेश की अदालत अपनी सेना के पूर्व कैप्टन अब्दुल मजीद को फांसी पर लटका चुकी है। वह शख्स 1975 में तख्तापलट के प्रयासों में शामिल रहा था। वह सेना व प्रशासन में उच्च पदों पर रहा। जब साल 1997 में शेख हसीना की सरकार आई तो फरार हो गया। बांग्लादेशी एजेंसियां उसे खोजती रहीं। आखिरकार वह 7 अप्रैल, 2020 को गिरफ्त में आया और उसी साल 12 अप्रैल को फांसी पर लटका दिया गया। मई 2016 में बांग्लादेश के सर्वोच्च न्याायलय ने मोतिउर्रहमान निज़ामी नामक शख्स को फांसी पर लटकाने का रास्ता साफ कर दिया था।

निजामी उस कुख्यात संगठन का मुखिया रह चुका था जिसने 1971 के युद्ध में बड़ी संख्या में हिंदुओं का नरसंहार किया। बाद में वह राजनीति में सक्रिय हुआ और बांग्लादेश की सरकार में मंत्री तक बना। शेख हसीना की सरकार ने उसके खिलाफ सबूत जुटाए और अदालत कठघरे में खड़ा किया। आखिरकार बांग्लादेशी अदालत ने फांसी की सजा पर मुहर लगाई। इस फैसले को रद्द कराने के लिए पाकिस्तान व तुर्की ने खूब जोर लगाया लेकिन शेख हसीना किसी के दबाव में नहीं आईं। यह शख्स तय समय पर ही फांसी पर लटकाया गया।

बांग्लादेशी अदालतों के ये फैसले न केवल राष्ट्रीय सुरक्षा बल्कि सद्भाव और वैचारिक स्वतंत्रता की रक्षा की दिशा में नजीर कहे जा सकते हैं। वैचारिक असहमति का जवाब विचारों से ही दिया जाना चाहिए। जो तत्व स्वतंत्र चिंतन को बर्दाश्त नहीं कर पाते, उसके जवाब में हिंसा पर उतर आते हैं, उनके लिए कठोर कदम उठाना ही उचित है। अन्यथा समाज में अध्ययन, चिंतन, मनन का मार्ग अवरुद्ध हो जाएगा।