अब अखंड बने भारत

दक्षिण भारत राष्ट्रमत में प्रकाशित संपादकीय
दक्षिण भारत राष्ट्रमत में प्रकाशित संपादकीय

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक का यह बयान न केवल भारत, बल्कि हमारे सभी पड़ोसी देशों के लिए विचारणीय है कि आज अखंड भारत की आवश्यकता है। यह कार्य किसी सैन्य बल से नहीं, सनातन धर्म की शक्ति से हो। हमारे अनेक स्वतंत्रता सेनानी अखंड भारत का स्वप्न देखते स्वर्ग सिधार गए। यह किसी पर आधिपत्य स्थापित करने, उसके ​अधिकारों का दमन करने की प्रतिज्ञा नहीं है। यह तो ऐसा शुभ संकल्प है जो एक भाई को दूसरे भाई से जोड़कर दोनों को शक्तिशाली बनाता है।

खासतौर से भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के निवासियों को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए कि विभाजन का जो बीज अंग्रेजों ने बोया था, उससे हमें क्या मिला। सात दशक बीत गए। यह कोई कम समय नहीं होता। आज पाकिस्तान कंगाल होने के कगार तक जा पहुंचा है। उसका वर्तमान नष्ट हो चुका है, भविष्य अंधकारमय है। वह कर्ज चुकाने के लिए कर्ज ले रहा है। मजहब के नाम पर अलग राष्ट्र की मांग तो उस क्षेत्र में की गई थी जो आज बांग्लादेश कहलाता है। बंटवारे के बाद जब वह पूर्वी पाकिस्तान बना तो उसके साथ क्या हुआ? पहले दिन से ही रावलपिंडी के जनरलों ने उससे तीसरे दर्जे के नागरिक की तरह बर्ताव करना शुरू कर दिया। आखिरकार यह टकराव युद्ध में परिवर्तित हुआ। यहां तक पहुंचते पहुंचते 30 लाख लोग मारे जा चुके थे।

इतने वर्षों में भारत ने जो प्रगति की है, वह प्रशंसनीय है, पर उसकी असल सामर्थ्य से बहुत कम है। हमें तो अमेरिका से आगे होना चाहिए था। विभाजन ने जो जहरीली फिजा बनाई, उसके बाद भारत के बजट का बड़ा भाग सिर्फ सुरक्षा पर खर्च किया जाने लगा। ऐसा जरूरी था। हमने युद्ध, आतंकवाद में हजारों जानें खोईं। बंटवारे से पहले जिन्ना द्वारा यह दलील दी गई थी कि यह कदम दोनों देशों में शांति कायम करने का एकमात्र उपाय है। आज हर कोई जानता है कि जिन्ना के विचार पूरी तरह गलत थे। उन्होंने भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश तीनों के निवासियों का बड़ा नुकसान किया है। अब जरूरी है कि हम लोग अपनी उन जड़ों को तलाशें जो हमें एक रख सकती हैं।

इस बात में तो कोई संदेह नहीं कि इन तीनों देशों में रहने वालों के पूर्वज एक थे। विदेशी आक्रांताओं से हमारा कोई संबंध नहीं है। हां, हमारी पूजन पद्धतियां भिन्न हो सकती हैं। इसके अलावा चाहे भाषा हो या खानपान, इतिहास, कड़वी-मीठी यादें वो सब एक हैं। अपनी जड़ों से जुड़े रहना बहुत जरूरी है। जिसका आधार मजबूत नहीं होता, उनकी प्रगति क्षणिक होती है। ढाका निवासी कोई शख्स यकीनन कोलकाता आकर ऐसा महसूस करेगा कि वह अपने घर आ गया है। इसी प्रकार लाहौर का बाशिंदा तेहरान के बजाय अमृतसर में अपनापन महसूस करेगा। अंग्रेजों ने भारतभूमि को इसलिए नहीं बांटा था क्योंकि वे हमारा भला चाहते थे। उन्होंने इसलिए बांटा ताकि भारत और बंटवारे से अस्तित्व में आए देश कभी प्रगति नहीं कर सकें।

हमारे पास इतने संसाधन, प्रतिभाएं हैं कि अगर भारत अखंड होता तो ज्ञान, विज्ञान और व्यापारिक प्रगति का केंद्र यूरोप, अमेरिका नहीं, भारत होता। भारत कई अवसर पर यह सिद्ध कर चुका है। अगर कोरोना महामारी की बात करें तो हमारे वैज्ञानिकों ने इसकी वैक्सीन बना ली है। जो देश आर्थिक रूप से संपन्न हैं, जो नवाचार के लिए जाने जाते हैं, आज वे भारत से वैक्सीन मंगवा रहे हैं। भारत सरकार चाहती तो इस मौके को मुनाफे के लिए भुना सकती थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सनातन संस्कृति की पताका लहराते हुए कई देशों को मुफ्त में वैक्सीन दी है।

अगर आज हम तीनों देशों के बीच वही ऐतिहासिक लगाव कायम हो जाए, भले ही भौतिक पहचान अपनी जगह रहे तो हमारी सामर्थ्य कई गुणा बढ़ जाएगी। हम तीनों मिलकर दुनिया का सबसे बड़ा बाजार बना सकते हैं। हम तीनों की ताकत से दुनिया की सबसे बड़ी और मजबूत सेना बन जाएगी। जब एक-दूसरे को मारने के लिए खरीदे जा रहे हथियारों का पैसा लोगों की शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार पर खर्च होगा तो यह इलाका बहुत समृद्ध हो जाएगा। यह काम किसी तरह के बल प्रयोग से नहीं हो सकता।

भारत का ऐसा कोई इरादा भी नहीं है। जोर-जबरदस्ती से किसी को कुछ समय के लिए दबाया तो जा सकता है, अपना नहीं बनाया जा सकता। यह हम सबकी चेतना, बुद्धि एवं विवेक से ही संभव है। बंटवारे ने हमें नफरत दी, हथियार दिए, बम धमाके दिए और आंसू दिए। अगर पाकिस्तान सोचता है कि जिस आत्मघाती मार्ग पर वह चल रहा है, उसमें कोई खुशहाल भविष्य उसका इंतजार कर रहा है तो यह हास्यास्पद है। आखिरकार उसे भारत के साथ ही आना होगा। इस शुभ कार्य में देरी नहीं करनी चाहिए।