इमरान का भाषण रद्द, श्रीलंका का सराहनीय कदम

फोटो स्रोत: इमरान खान फेसबुक पेज।
फोटो स्रोत: इमरान खान फेसबुक पेज।

श्रीलंका ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान के श्रीलंकाई संसद में प्रस्तावित संबोधन को रद्द करके समझदारी का ​काम किया है, जिसके लिए हमारा यह पड़ोसी देश प्रशंसा का पात्र है। इमरान खान हों या पाकिस्तान के वरिष्ठ मंत्री या सेना प्रमुख, इन्हें जहां भी मौका मिलता है, एक ही मुद्दे पर विलाप करना शुरू कर देते हैं, वो है कश्मीर। इसके अलावा इनसे और किसी चीज की उम्मीद नहीं की जा सकती। कोई राष्ट्रप्रमुख यह आशा नहीं कर सकता कि जब उसके यहां पाकिस्तान का कोई प्रतिनिधि आएगा, तो वह निवेश लेकर आएगा।

इमरान खान हाल में अफगानिस्तान जाकर आए हैं, जो वर्षों से हिंसा, आतंकवाद, गरीबी से जूझ रहा है। इमरान खान उस देश से भी कुछ न कुछ आर्थिक सहायता ले ही आए! श्रीलंका को पता था कि अगर इमरान को उसकी संसद को संबोधित करने का अवसर दे दिया तो वे वही जहर उगलेंगे जो प्राय: हर पाकिस्तानी की बुद्धि में बचपन से ही कूट-कूटकर भरा होता है। भारत चंद्रमा तक पहुंच गया, जबकि पाक की गाड़ी 1947 में ही अटकी हुई है।

पाकिस्तान ने बड़ा आग्रह किया था कि श्रीलंका इमरान को अपनी संसद में बोलने का मौका दे। पहले पहल श्रीलंका मान भी गया था, फिर उसे पाक की पुरानी आदत याद आई तो विनम्रतापूर्वक मना कर दिया। अब कारण चाहे कोविड बताया गया हो या कुछ और, यह साफ है कि श्रीलंका उसके उन शब्दों में कोई रुचि नहीं रखता ​जो हर मंच पर बार-बार दोहराए जाते हैं। गोया और कोई मसला ही न रहा हो।

इमरान के संबोधन पर कैंची चली तो इसके लिए भी भारत की ओर अंगुली उठाई जा रही है। वैसे भारत को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि इमरान कब, कहां उसके खिलाफ क्या बोलते हैं। भारत सत्य पर है। सांच को आंच नहीं। यह तो श्रीलंका की सरकार ने दूरदर्शिता दिखाते हुए इमरान को आईना दिखा दिया कि उसके हित भारत से मिलते हैं, पाक से नहीं। इस मुल्क के लिए वह सदियों पुराने मित्र के साथ संबंध नहीं ​बिगाड़ सकता।

इस बात की पूरी संभावना थी कि इमरान खान ज्यों ही श्रीलंकाई संसद में माइक थामते, वे शुरुआती संबोधन के बाद कश्मीर राग पर आ जाते। भारत अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निष्प्रभावी करने के बाद अपने रुख पर अडिग है। अब यह अनुच्छेद वापस नहीं आएगा, चाहे इमरान श्रीलंका की संसद में जाएं या व्हाइट हाउस के सामने माथा टेकें। इसके अलावा श्रीलंका के सियासी हलकों में चर्चा थी। कई जनप्रतिनिधि नहीं चाहते थे कि इमरान यहां आकर किसी नए विवाद को हवा दे जाएं।

चूंकि इमरान दूसरे देशों को मानवाधिकार, लोकतंत्र, अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर प्रवचन देने में माहिर हैं। यह अलग बात है कि वे अपने मुल्क में इन पर कभी अमल नहीं करते। श्रीलंकाई जनप्रतिनिधियों को अंदेशा था कि अगर इमरान को संसद में बोलने दिया तो वे बहुसंख्यकों द्वारा मुस्लिम आबादी के ​साथ कथित भेदभाव का मुद्दा उठाकर इस्लामाबाद में वाहवाही लूटने की कोशिश करेंगे। इससे बौद्ध धर्मगुरु नाराज हो सकते थे।

चूंकि श्रीलंका सरकार ने पूर्व में यह अनिवार्य कर दिया था कि जिस व्यक्ति की कोरोना के कारण मृत्यु होगी, उसका दाह संस्कार किया जाएगा। यह नियम मुसलमानों समेत सभी पर लागू किया गया था। इसका पाकिस्तान के विभिन्न संगठनों ने विरोध किया था। हालांकि बाद में मुसलमानों को यह छूट दी गई कि वे चाहें तो शव को दफना सकते हैं। इमरान इस मौके को हथियाकर चैंपियन बनना चाहते थे। इसके साथ अपने यहां पलने वाले कट्टरपंथी संगठनों के आकाओं को साधना एक लक्ष्य था ताकि बदहाल अर्थव्यवस्था के बावजूद वे उनके साथ आ जाएं।

पाकिस्तान को चाहिए कि वह सामान्य मनोस्थिति में आने का प्रयास करे, महामारी में लोगों की जान की फिक्र करे, अपनी अर्थव्यवस्था को बेहतर बनाए, भारत के साथ संबंध सुधारे। भारत सबकी मदद करता रहा है, उसकी भी कर देगा। अब दुनिया के पास हर मंच से पाक का एक ही राग सुनने के लिए न वक्त है और न कोई दिलचस्पी। इस बात को वह जितनी जल्दी कबूल कर ले, उसी में भलाई है।