संपादकीय: कांग्रेस में खटपट जारी

दक्षिण भारत राष्ट्रमत में प्रकाशित संपादकीय
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कांग्रेस के खेमे से एक विकेट और गिर गया। वरिष्ठ नेता पीसी चाको पार्टी को इस्तीफा पकड़ा गए। एक के बाद एक नेताओं का कांग्रेस से मोह भंग होते जाना इस पार्टी के लिए बड़ी चुनौती है। आखिर क्या वजह है कि स्वतंत्रता संग्राम से लेकर संप्रग-2 तक सत्ता में रही कांग्रेस साल 2014 से अब तक विपक्ष में रहकर खुद को एकजुट नहीं रख पा रही है? चाको कोई आजकल के कांग्रेसी नहीं हैं। उन्होंने इस पार्टी के झंडे तले कई मौसम देखे हैं। उनके द्वारा यह आरोप लगाना कि गुटबाजी हावी है, पार्टी दो धड़ों में बंटी हुई है, आलाकमान चुपचाप देख रहा है …पार्टी के लिए विचारणीय और चिंतनीय हैं।

ये आरोप कांग्रेस पर लंबे समय से लगते रहे हैं। अब उसे मंथन करना चाहिए कि उसके साथ रहे नेता ‘हाथ’ छोड़कर क्यों जा रहे हैं? कहीं उसकी रीति-नीति में तो कोई कमी नहीं है? कांग्रेस साल 2014 के लोकसभा चुनावों में हार के बाद से ही ढलान पर है। कुछेक राज्यों में बमुश्किल जीत को छोड़ दें तो ऐसे नतीजे बहुत कम देखने को मिले जिनसे साबित होता हो कि कांग्रेस ​मजबूती से वापसी कर रही है। कौन सोच सकता था कि ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे नेता, जो राहुल गांधी के इतने करीबी माने जाते थे, एक दिन कांग्रेस को नमस्कार कह देंगे! इसी उथल-पुथल में कमलनाथ के नेतृत्व वाली मध्य प्रदेश सरकार भी धराशायी हो गई। ​कर्नाटक में वह सत्ताधारी सरकार में सहयोगी थी, लेकिन सरकार नहीं बचा सकी।

राजस्थान में सचिन पायलट बागी हो गए। गहलोत खेमे और पायलट में जमकर आरोप-प्रत्यारोप के बाण चले। आमतौर पर शांत दिखने वाले गहलोत ने कुछ ऐसे शब्द कहे जो अप्रत्याशित और अशोभनीय थे। पायलट वापस लौट तो आए पर ‘प्रीत का धागा’ टूट चुका था। अब जोड़ भी लें तो गांठ छिपा नहीं सकते। पुड्डुचेरी में कांग्रेस की सरकार का गिरना तो कल की बात है। यह इसका उदाहरण है कि पार्टी धीरे-धीरे आधार खो रही है। कहीं कार्यकर्ताओं में नाराजगी है तो कहीं नेताओं में असंतोष है। अमेठी से हारने के बाद राहुल शीर्ष नेतृत्व से हट गए हैं। उस समय ऐसी चर्चा थी कि अब कांग्रेस अपनी गलतियों का अहसास करेगी, मंथन करेगी और अगला अध्यक्ष कोई नया चेहरा होगा।

पर कांग्रेस में अंतरिम अध्यक्ष के नाम पर फिर सोनिया गांधी ने बागडोर संभाल ली। पार्टी की कमान माता से पुत्र को मिली थी, वह पुन: माता को प्राप्त हो गई। ऐसे में कार्यकर्ताओं और देशवासियों में यही संदेश गया कि कांग्रेस में पूर्ण लोकतंत्र नहीं है। यह एक परिवार से आगे नहीं बढ़ रही है। जबकि इस बीच भाजपा की पकड़ लगातार मजबूत होती गई।

मोदी-शाह ने आलोचना, निजी हमले, आरोप झेले, लेकिन पार्टी का जनाधार कमजोर नहीं पड़ने दिया। एकाध बार कहीं झटके लगे तो उसकी भरपाई अन्य राज्यों से हो गई। भाजपा को इस बात का श्रेय जरूर दिया जाना चाहिए कि उसका शीर्ष नेतृत्व किसी परिवार पर आश्रित नहीं है। आज जो लोग भाजपा शासन में संगठन और सरकार चला रहे हैं, वे कड़ी मेहनत से तपकर आए हैं। उन्होंने चाय बेचने से लेकर पार्टी बैठकों में दरी बिछाने तक का काम किया है। वे इसे छिपाते भी नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं को उम्मीद देते हैं कि अपनी काबिलियत से आप यहां तक पहुंच सकते हैं।

कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व कार्यकर्ताओं से दूर होता गया। कई नेता दबी जुबान से यह तक कहते हैं कि कांग्रेस में जो नेता कार्यकर्ताओं से जितना दूर होता है, वह उतना ही बड़ा कहलाता है। यह संस्कृति शुभ फलदायक नहीं हो सकती। कांग्रेस में ऐसे नेताओं की लंबी सूची है जिन्होंने संगठन को पूरा जीवन दिया है। अक्सर यह पाया जाता है कि वे युवा पीढ़ी से तालमेल नहीं बैठा पाते। इसकी परिणति मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसी बगावत के रूप में सामने आती है। बहरहाल, चुनौतियां कई हैं और कांग्रेस को यह तय करना है कि वह स्वयं को भविष्य में कहां देखना चाहती है।