रिंकू शर्मा की निर्मम हत्या

प्रतीकात्मक चित्र। फोटो स्रोत: PixaBay
प्रतीकात्मक चित्र। फोटो स्रोत: PixaBay

दिल्ली के मंगोलपुरी में रहने वाले युवक रिंकू शर्मा की चाकू से गोदकर हत्या की घटना रोंगटे खड़े करने वाली है। डंडे, चाकू से लैस दर्जनभर लोगों की भीड़ ने जिस तरह देश की राजधानी में निहत्थे परिवार पर कहर बरपाया और एक सदस्य की बेरहमी से जान ले ली, उससे कई सवाल खड़े होते हैं। परिवार ने हमलावरों पर गंभीर आरोप लगाए हैं जिनकी जांच होनी चाहिए। पुलिस ने अब तक मोहम्मद दानिश, तसुद्दीन, मोहम्मद इस्लाम, जाहिद और मोहम्मद मेहताब नामक आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है।

क्या अब लोग देश की राजधानी में अपने घरों में भी सुरक्षित नहीं हैं? हमलावर जिस तरह घर में घुसे, रिंकू के परिजनों से मारपीट की, उसके बाद तो यह सवाल पूछा जाना जरूरी है कि कुछ लोगों के मन में कानून का खौफ क्यों नहीं है? विभिन्न टीवी चैनलों पर दिखाए जा रहे सीसीटीवी फुटेज से पता चलता है कि हाथ में डंडे ​लेकर जा रहे हमलावर किस तरह खुद को बेखौफ महसूस कर रहे थे।

इस घटना की निंदा कर देने मात्र से कुछ नहीं होगा। रिंकू शर्मा को इंसाफ मिलना चाहिए और हत्यारों को ऐसी सजा मिले कि वह भविष्य के लिए नजीर बने। घटना के बाद सोशल मीडिया पर उबाल है। पीड़ित परिवार से सहानुभूति होना स्वाभाविक है, होनी भी चाहिए, इंसाफ के लिए आवाज उठानी चाहिए। मामले को लेकर पुलिस और मृतक के परिजनों के जो बयान सामने आए हैं, उनमें कुछ विरोधाभास दिखाई देता है। पुलिस के अनुसार, युवकों के बीच झगड़े के तार किसी रेस्टोरेंट से जुड़े हैं, जबकि परिवार का आरोप है कि रिंकू की हत्या का कारण उसका हिंदूवादी कार्यकर्ता होना है।

आरोपों के अनुसार, रिंकू का संबंध बजरंग दल से रहा है। उसने पिछले साल अगस्त में मोहल्ले में श्रीराम रैली निकाली थी। वह राम मंदिर निर्माण हेतु आर्थिक सहयोग जुटाने वाली टीम में भी था। इन सबसे उक्त आरोपी चिढ़े हुए थे। उपलब्ध वीडियो में हमलावरों के हाथों में घातक हथियार साफ देखे जा सकते हैं। पुलिस ने केवल पांच आरोपियों को अब तक गिरफ्तार किया है जबकि हमलावर 10 -12 की संख्या में थे। पुलिस को इस मामले की गहराई से छानबीन करनी चाहिए और सभी आरोपियों को गिरफ्तार कर उनके खिलाफ पुख्ता सबूत जुटाकर केस मजबूत बनाकर न्यायालय में पेश करना चाहिए।

घटना से रिंकू का ​परिवार सहमा हुआ है। वह पुलिस से सुरक्षा की मांग कर रहा है। ऐसे समय में एक सवाल उन ‘बुद्धिजीवियों’ से भी होना चाहिए जिन्हें अक्सर भारत असहिष्णु, असुरक्षित लगता रहता है। क्या उनमें से कोई रिंकू शर्मा के परिवार के लिए इंसाफ की मांग करेगा? क्या हामिद अंसारी रिंकू शर्मा के घर जाकर उसके मां-बाप के आंसू पोंछने का हौसला दिखाएंगे? क्या नसीरुद्दीन शाह को ऐसी घटनाओं से डर नहीं लगता? क्या आमिर खान बताएंगे कि यह असहिष्णुता का कौनसा प्रकार है? क्या रिंकू शर्मा की मौत से दुखी होकर कोई अवॉर्ड वापस करेगा? क्या ​इस हत्या के विरोध में कोई एंकर अपने चैनल की स्क्रीन काली करेगा?

ऐसी घटनाओं पर इन तमाम ‘बुद्धिजीवियों’ को सांप सूंघ जाता है। वे गहरी मूर्च्छा में चले जाते हैं। आखिर क्यों? इसका जवाब उन्हें देना चाहिए, अन्यथा देश यही समझेगा कि उनकी मूर्च्छा सिर्फ मजहब देखकर टूटती है। रिंकू शर्मा की मौत का विरोध करने में वह सनसनी नहीं, जो यह साबित कर सके कि वाकई देश असहिष्णु हो गया है। इसमें वह प्रचार नहीं जो आपको देश-विदेश में एक सेलेब्रिटी ‘बुद्धिजीवी’ के तौर पर स्थापित कर सके। हम यहां स्पष्ट करना चाहेंगे कि ऐसी घटनाओं में हत्या किसी की भी हो, वह बिल्कुल गलत है। चाहे दोषी कोई भी हो, उसे दंड मिलना चाहिए। परंतु पिछले कुछ वर्षों में विरोध का जो खास ट्रेंड सामने आया है, वह दुखद और निंदनीय है।

कुछ स्वनामधन्य क्रांतिकारी ‘बुद्धिजीवियों’ की बुद्धि में ऊर्जा का संचार मृतक का मजहब देखकर ही होता है। उसके बाद ये मोमबत्ती लेकर निकल पड़ते हैं। अवॉर्ड लौटाते हैं। काली पट्टी बांधते हैं और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों तक अपनी बात पहुंचाते हैं। उन्हें हिंदुस्तान में लिंचिस्तान नजर आने लगता है। हमारा मत है कि वे यह करने के लिए स्वतंत्र हैं, बिल्कुल करें, कानून इस बात की इजाजत देता है। बस छोटा-सा अनुरोध है कि कभी-कभार मजहब से परे सिर्फ इंसान देखकर भी किसी के हक में आवाज बुलंद कर दिया करें। जान गंवाने वाला एक इंसान होता है, इसलिए ऐसी किसी भी घटना को सांप्रदायिक रंग देना उचित नहीं है।