ग्रामीण अर्थव्यवस्था को तकनीक से मिले ताकत

भारतीय किसान। फोटो स्रोत: PixaBay
भारतीय किसान। फोटो स्रोत: PixaBay

पिछले साल कोरोना महामारी के कारण लगाए गए देशव्यापी लॉकडाउन में जिन क्षेत्रों ने अर्थव्यस्था के ​ग्राफ को और नीचे जाने से थामे रखा, उनमें खेती और ग्रामीण क्षेत्रों पर आधारित उद्योग प्रमुख थे। जहां बड़े शहरों, महानगरों में कारखाने, मॉल आदि बंद रहे, लोगों ने नौकरियां गंवाई, वहीं ग्रामीण भारत एक बार फिर अपनों के स्वागत को आतुर दिखा। अब जरूरी है कि भविष्य की अर्थव्यवस्था को इस तरह आकार दिया जाए जिसमें ग्रामीण और लघु उद्योगों की और ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका हो। ये सशक्त हों।

राष्ट्रीय राजधानी के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में ‘हुनर हाट’ पहुंचे रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का यह कहना कि अगले दो-तीन वर्षों में ग्रामीण उद्योग के वार्षिक कारोबार को 80 हजार करोड़ रुपए से पांच लाख करोड़ रुपए तक पहुंचाने का लक्ष्य है, सराहनीय है। उनका यह कथन भी सर्वथा उचित है कि शिल्पकार और हस्तकार देश की अर्थव्यवस्था में बहुत योगदान दे सकते हैं। विडंबना यह है कि उन्हें जितना प्रोत्साहन मिलना चाहिए था, वह नहीं मिल पाया है।

वास्तव में ग्रामीण अर्थव्यवस्था में संभलने और मजबूती से चल पड़ने की बहुत सामर्थ्य है। इसकी जड़ें बहुत गहरी हैं। अगर इसे तकनीक की ताकत से जोड़ दिया जाए, सरकार अपने स्तर पर बढ़ावा देने का प्रयास करे, तो यह क्षेत्र सबको चौंका सकता है। लेकिन अब तक इसे बढ़ावा देने के प्रयास संतोषजनक नहीं रहे।

क्या यह मुमकिन है कि वाजिब कीमत पर राजस्थान का कुर्ता मणिपुर में खरीदा जाए, नागालैंड का अचार बेंगलूरु में आसानी से मिल जाए, चेन्नई की साड़ी हिमाचल पहुंच जाए और उत्तराखंड के मसाले गोवा में खाने का जायका बढ़ाएं? अगर एक मजबूत इच्छाशक्ति के साथ प्रयास किए जाएं तो यह बिल्कुल संभव है। भारत के हर गांव में कोई न कोई हुनर समाया है। जरूरत है इसे निखारने और बढ़ावा देने की। ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए सरकार इंटरनेट का इस्तेमाल करे। ऐसी वेबसाइट्स बनाई जाएं जिनके जरिए ग्रामीण हुनर निखरे, अपने उत्पाद आसानी से बेच सकें। इसके लिए सरकार अपने डाकघरों के नेटवर्क का इस्तेमाल करे जिसकी पहुंच हर महानगर, शहर, गांव, ढाणी तक है।

यह समूचा तंत्र ग्रामीण अर्थव्यवस्था को आने वाले कुछ वर्षों में इस काबिल बना सकता है कि फिर शहरों की ओर पलायन काफी कम हो सकता है। अगर आमजन को गांवों में ही शिक्षा, रोजगार, चिकित्सा सुविधाएं सुलभ हों तो महानगरों की ओर पलायन न हो, लोगों का हुनर ही उनके लिए रोजगार बन जाए तो गांव की रोटी महानगरों के पकवान से ज्यादा मीठी लगेगी।

ई-मार्किट मंच (जीईएम) की सहायता से लोग सीधे दस्तकारों, शिल्पकारों, कारीगरों से सामान खरीद भी रहे हैं। निश्चित रूप से यह एक अच्छी पहल है, जिससे अधिकाधिक लोगों को जोड़ने की जरूरत है। इसके साथ ग्रामीण युवाओं के कौशल में निखार लाने की जरूरत है। लॉकडाउन में बहुत से युवा अपने गांव लौट गए जिन्होंने वर्क फ्रॉम के जरिए अपने कर्तव्यों का निर्वहन किया। सरकार कंपनियों को इस बात के लिए प्रोत्साहित करे कि वे छोटे शहरों और गांवों का रुख करें। वे युवाओं में कौशल का निवेश करें।

इसमें शुरुआत में कुछ चुनौतियां हो सकती हैं पर भविष्य में फायदा बड़ा है। जब राजस्थान, बिहार, सिक्किम, लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश और देश के किसी भी गांव का युवा वहां रहते हुए काम करेगा तो इसका सीधा फायदा वहां की अर्थव्यवस्था को होगा। इसे एक उदाहरण से समझ सकते हैं। श्रीमान् ‘क’ लद्दाख के किसी गांव में दर्जी की दुकान चलाते हैं। यहां उनके सिले विशेष परिधान सिर्फ उनके गांव के लोग खरीदते हैं। सरकार उनके कौशल विकास का काम करे, उन्हें कुछ तकनीकी प्रशिक्षण देकर आनलाइन मंच उपलब्ध कराए।

इससे पर्यटकों सहित लद्दाख या दूसरे राज्यों में रहने वाले लोग भी उनके परिधान आसानी खरीद सकेंगे। अब जो राशि श्रीमान् ‘क’ के बैंक खाते में जाएगी, वह उनके गांव में खर्च होगी। इससे मांग पैदा होगी। दूसरे दुकानदारों को अपने आप फायदा मिलने लगेगा। अगर पूरे ग्रामीण भारत में यह चक्र शुरू हो जाए तो कितना बड़ा क्रांतिकारी परिवर्तन हो सकता है! ग्रामीण हुनरमंद, सक्षम होंगे, उन्हें ​उपयुक्त मंच मिलेगा तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था नई करवट लेगी।

इसका फायदा उस व्यक्ति विशेष तक सीमित नहीं रहता, बल्कि रुपए का प्रवाह दूसरों तक जाता है। वे लाभान्वित होते हैं और धीरे-धीरे लोगों के जीवनस्तर में सकारात्मक बदलाव आने लगता है। इससे ‘स्वदेशी’ एवं ‘वोकल फॉर लोकल’ की भावना बलवती होगी। अनाज, दूध, पशुपालन, कृषि उपकरण, खाद, जैविक कीटनाशक — ये कुछ उदाहरण हैं जिनमें तकनीक के प्रयोग की भरपूर संभावनाएं हैं। जरूरत है कि यहां दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ तकनीक का सकारात्मक उपयोग हो।