पाक का नया पैंतरा: बाजवा अचानक क्यों अलापने लगे शांति का राग?

फोटो स्रोत: PixaBay
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पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा के अचानक बदले सुरों से किसी को हैरान नहीं होना चाहिए। इसे न तो पाकिस्तान का हृदय-परिवर्तन समझा जाना चाहिए और न ही सद्बुद्धि की प्राप्ति। पाकिस्तान के तेवर अब इसलिए ढीले पड़ रहे हैं क्योंकि उस पर एफएटीएफ की तलवार लटकी है।

जनरल बाजवा ने कहा है कि यह सभी दिशाओं में शांति का हाथ बढ़ाने का समय है। वे रिसालपुर में पाकिस्तानी वायुसेना के एक कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने कहा कि कश्मीर का मसला गरिमापूर्ण और शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाना चाहिए। उन्होंने यह दावा भी कर दिया कि पाकिस्तान एक शांतिप्रिय देश है जिसने क्षेत्रीय और वैश्विक शांति के लिए बहुत बड़े बलिदान दिए हैं। साथ ही कहा कि हम परस्पर सम्मान और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के आदर्श पर चलने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

आखिर पाकिस्तान अचानक शांति की बातें क्यों करने लगा? भारत ने तो हमेशा ही शांति का हाथ बढ़ाया है लेकिन बदले में उसे मिला क्या? जब वाजपेयी दोनों देशों के बीच रिश्ते बेहतर करने की उम्मीद में लाहौर गए थे तो पाकिस्तान ने कारगिल युद्ध छेड़ा। जब मोदी नवाज शरीफ से मुलाकात के लिए गए तो पठानकोट, उरी और पुलवामा हुआ।

आर्थिक मोर्चे पर बुरी तरह तबाह और कंगाली के कगार पर पहुंचा पाकिस्तान अब अमेरिका में नए-नवेले बाइडन प्रशासन को मनाने की जुगत में है। बाजवा अपने शब्दों में शांति की चाशनी घोल रहे हैं ताकि बाइडन प्रशासन पाक को एफएटीएफ की ग्रे लिस्ट से निकाले और लगे हाथ कर्जा भी दे दे ताकि उसका इस्तेमाल दोबारा आतंकवाद फैलाने में किया जा सके।

बाजवा के उक्त बयान के बाद दोनों देशों के मीडिया में चर्चा है कि पाक कश्मीर को लेकर भारत से बातचीत करना चाहता है। कुछ भावुक ‘बुद्धिजीवियों’ को इस बयान के बाद बाजवा में अमन के फरिश्ते के दर्शन भी हो सकते हैं!

वास्तव में किसी को इस भ्रम में नहीं रहना चाहिए कि पाकिस्तान ने अतीत की गलतियों से कोई सबक ले लिया और अब सुबह का भूला शाम को घर आ गया है। पाकिस्तान उस शख्स की तरह है जिसे बुरी तरह नशे की लत लग चुकी है और जेबें खाली हैं। जिस दिन उसकी जेब में पैसे आएंगे, वह वो ही कारनामे दोहराएगा जो अब तक करता रहा है।

भारत सरकार द्वारा अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निष्प्रभावी बनाए जाने के ​बाद पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर के लोगों की सुरक्षा, मानवाधिकारों के मुद्दे पर पूरी दुनिया में विलाप करता फिरा था। यह अलग बात है कि किसी ने उसे तवज्जो नहीं दी। अनुच्छेद 370 के प्रावधान हटाए ही इसलिए गए थे ताकि जम्मू-कश्मीर के लोगों की आतंकवाद से सुरक्षा हो, उनके मानवाधिकार पुख्ता हों, युवाओं को रोजगार मिले, पर्यटन बढ़े, आतंकवाद का डंक टूटे और जम्मू-कश्मीर राष्ट्र की मुख्यधारा में आए।

भारत सरकार के इस कदम से अलगाववादियों की दुकानें बंद होने लगीं। पाकिस्तान में बैठे अपने आकाओं के हुक्म पर घाटी में जहर घोलने वाले ये लोग देश को ब्लैकमेल करते रहे हैं। इन्हें ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ और खास ‘बुद्धिजीवियों’ का समर्थन तुरंत मिल जाता है। फिर ये टीवी स्टूडियो में बैठकर भारत के लिए अभद्र शब्दों का इस्तेमाल करते हैं। यह भारत ही है जो अब तक ऐसे तत्वों को बर्दाश्त करता रहा है। अगर ये तथाकथित ‘एक्टीविस्ट’ पाकिस्तान में होते तो अब तक आईएसआई इन्हें किसी गुमनाम कब्र में फेंक चुकी होती।

कश्मीर को लेकर पाकिस्तान भारत से कई युद्ध लड़ चुका है। इससे उसको कश्मीर की एक इंच जमीन नहीं मिली, जबकि 1971 में आधा मुल्क गंवा दिया। अब पाकिस्तान को यह समझ में आ गया है कि वह प्रत्यक्ष युद्ध में भारत से मुकाबला नहीं कर सकता, लिहाजा आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा है। साथ ही अमेरिका और दुनिया को दिखाने के लिए ‘शांति’ का पैंतरा भी चल रहा है।

बाजवा के सुर इसलिए भी बदले हैं क्योंकि जो बाइडन उन्हें एफएटीएफ की नैया पार कराने के लिए आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई करने और भारत के साथ शांति कायम रखने की नसीहत दे सकते हैं। व्हाइट हाउस से कोई फोन आता, इससे पहले ही पाकिस्तान ने बाजवा से यह बयान दिलवाकर खुद को शांतिदूत की तरह पेश करने का दांव चला है। भारत सरकार को समय-समय पर इसका पर्दाफाश करते रहना चाहिए, क्योंकि जिस मुल्क की बुनियाद ही भारत से नफरत पर टिकी है, वह कभी हमारा हितैषी नहीं हो सकता।