घातक लापरवाही

दक्षिण भारत राष्ट्रमत में प्रकाशित संपादकीय
दक्षिण भारत राष्ट्रमत में प्रकाशित संपादकीय

देश में कमोबेश फिर वैसे ही हालात पैदा हो रहे हैं जैसे कि इस साल फरवरी में देखे गए, जब कोरोना संक्रमण के मामलों में गिरावट आ रही थी। नए मामले दस हजार से कम हो रहे थे। कई जगह कोविड देखभाल केंद्र बंद किए जा रहे थे। यहां तक कि राजनेताओं को भी लग रहा था कि दुनिया की 18 फीसद आबादी वाले देश ने कोरोना महामारी को प्रभावी ढंग से रोककर मानवता को एक बड़ी आपदा से बचा लिया है। कमोबेश ऐसा ही अति आत्मविश्वास लोगों के स्तर पर भी था, जो मानकर चल रहे थे कि कोरोना हमेशा-हमेशा के लिए वुहान चला गया है। फिर, हमारी लापरवाही के चलते दूसरी भयावह लहर का दंश देश ने भोगा।

चूंकि देश में अनलॉक प्रक्रिया के साथ फिर उसी तरह की बेफिक्री और लापरवाही सामने आने लगी है जैसे कि इस साल की शुरुआत में पहली लहर के उतार के वक्त देखी गई थी। कोरोना संक्रमण से बचाव के लिए जारी निर्देश फिर भुलाए जाने लगे हैं। लापरवाही के ये नजारे हर कहीं देखे जा सकते हैं। बाजारों के खुलते ही सोशल डिस्टेंसिंग की जरूरत को नजरअंदाज किया जा रहा है। फेस मास्क नाक से उतरकर ठोड़ी तक आ चुके हैं। सैर-सपाटे पर निकलने को आतुर लोगों की कारों के काफिले हिल स्टेशनों की तरफ कूच करने लगे हैं। कोरोना की दूसरी लहर की भयावहता के बाद लोगों में जो धैर्य भय से नजर आ रहा था, उसे दरकिनार करने की होड़ जैसी लगी है।

हम न भूलें कि कोरोना संकट अभी खत्म नहीं हुआ है। आंकड़े इस ओर साफ संकेत दे रहे हैं कि अभी सजग रहने का समय है। एक लापरवाही सब पर भारी पड़ सकती है। बुधवार को स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से संक्रमण के जो आंकड़े सामने आए, उनमें संक्रमितों की संख्या 62 हजार से ज्यादा बताई गई। मरने वालों की संख्या भी ढाई हजार के पार रही। अगर अभी इसे कोरोना संकट से मुक्ति कह रहे हैं तो यह जल्दबाजी होगी। वह भी तब जब स्वास्थ्य विशेषज्ञ तीसरी लहर के आने की आशंका जता रहे हैं। हम यह न भूलें कि यूरोप व एशिया के कई देश तीसरी-चौथी लहर से जूझ रहे हैं।

ऐसा लग रहा है कि लोग अप्रैल-मई में महामारी के भयावह दृश्यों को भूल गए हैं। जब बेड न मिलने के कारण अस्पताल के बाहर दम तोड़ रहे थे। ऑक्सीजन सिलेंडर के लिए लोग रात-रातभर कतारों में लगे रहे। श्मशान घाटों में अंतिम संस्कार के लिए जगह नहीं मिल रही थी और पार्क व खेल मैदानों को श्मशान घाटों में बदल दिया गया। इसके बावजूद लापरवाही जारी है। हमें याद रखना चाहिए कि कोरोना की दूसरी मारक लहर के दौरान एक अप्रैल के बाद से दो लाख से अधिक लोगों को महामारी ने लील लिया।

बेशक संक्रमण के मामले घटे हैं लेकिन इतने कम भी नहीं हुए हैं कि लापरवाही के रास्ते चल पड़ें। किसी भी तरह की लापरवाही तीसरी लहर को आमंत्रित करेगी, जिसके आने को चिकित्सा विज्ञानी अपरिहार्य मान रहे हैं। लापरवाही किस स्तर पर बरती जा रही है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि चंडीगढ़ में 23 मार्च के बाद सुरक्षा नियमों की अनदेखी करने के कारण 50 हजार लोगों पर जुर्माना लगाया गया। कोलकाता में नियमों का उल्लंघन करने पर प्रतिदिन 600 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया या मुकदमा चलाया गया।

प्रशासन लोगों को रोक पाने में असफल नजर आ रहा है। जैसे ही मुंबई खुलना शुरू हुआ, फेस मास्क का उल्लंघन करने वालों की संख्या दोगुनी हो गई। मुंबई नगर निगम ने अप्रैल से अब तक 57 करोड़ से अधिक रुपए का जुर्माना वसूला है। वहीं बेंगलूरु पुलिस का कहना है कि जुर्माना व वाहन जब्ती के बावजूद लोग नियम तोड़ने से बाज नहीं आ रहे हैं। अगर लोगों का जमघट लगेगा तो कोरोना संक्रमण फैलने की आशंका को नकारा नहीं जा सकता है। देश का स्वास्थ्य ढांचा पहले ही चरमराया हुआ है। ऐसे में किसी भी स्तर पर लापरवाही घातक सिद्ध हो सकती है।