अग्निकुंड से प्रकट हो रही ज्योति
अग्निकुंड से प्रकट हो रही ज्योति

बाकू/दक्षिण भारत। भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश सहित आसपास के विभिन्न देशों में सनातन धर्म के कई पूजन स्थल हैं जो अध्यात्म के साथ ही इतिहास के भी बड़े स्रोत हैं। हाल में जब अजरबैजान और आर्मीनिया की सेनाओं में भिड़ंत हुई तो इन दोनों देशों से संबंधित कई स्थान भी चर्चा में रहे। इनमें से एक है- आतिशगाह, जिसे प्राचीन तीर्थ माना जाता है और इसका भारत गहरा संबंध रहा है।

हालांकि, आज भारत में इसके बारे में जानने वाले बहुत कम हैं लेकिन एक समय था जब यहां भारतीयों की रौनक होती थी और वे पूजा करके ही आगे बढ़ते थे। इसे अग्निमंदिर भी कहा जाता है। यह मंदिर अजरबैजान के सुराखानी नामक स्थान पर स्थित है। ​इन दिनों इसकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर खूब शेयर की जा रही हैं।

अब यह जगह आमतौर पर सुनसान रहती है पर एक जमाना था जब भारत से बड़ी संख्या में हिंदू श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए जाते थे। इनमें से ज्यादातर व्यापारी होते थे जो कारोबार के सिलसिले में यहां से निकलने वाले रास्ते का उपयोग करते थे।

कब से जल रही है ज्योति?
वास्तव में यहां का मुख्य आकर्षण है लगातार जल रही ज्योति, जिसे अखंड ज्योति कहा जाता है। ठीक हिमाचल के ज्वाला देवी मंदिर की तरह। बीते वर्षों में कितने ही आंधी-तूफान आए और हालात ने इस जगह का कड़ा इम्तिहान लिया, पर ज्योति जलती रही। यह ज्योति कब से जल रही है, ठीक-ठीक कोई नहीं जानता।

पुराने जमाने में भारतीय कारोबारियों के काफिले यहां से गुजरा करते थे। उनमें से ज्यादातर कारोबारी उत्तर भारत से होते थे। जब वे इस मंदिर के निकट से गुजरते तो यहां आशीर्वाद लेने जरूर आते।

गुरुमुखी में शिलालेख
इस मंदिर में एक पुराना शिलालेख मौजूद है। यह गुरुमुखी लिपि में ​उत्कीर्ण किया गया है, अत: इसकी प्रबल संभावना है कि पंजाब और उसके आसपास के इलाकों से आने वाले श्रद्धालुओं का इस स्थान से काफी लगाव रहा है।

यहां स्थित अग्निकुंड के पास एक त्रिशूल भी है। चूंकि त्रिशूल शिवजी और दुर्गा – दोनों का शस्त्र है। इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि इस स्थान का सनातन धर्म से बहुत गहरा रिश्ता है। मंदिर के पास कुछ कोठरियां बनी हुई हैं। इनमें श्रद्धालु ठहरा करते थे।

कैसे सुनसान हुआ इलाका?
ऐतिहासिक विवरण बताते हैं कि 1860 ई. के बाद यह इलाका वीरान होने लगा। पुजारी भी मंदिर छोड़कर चला गया। चूंकि उस दौरान भारत में राजनीतिक उथलपुथल जारी थी। क्रांतिकारियों और अंग्रेजों के बीच जंग चल रही थी। ऐसे में कारोबार पर बुरा असर पड़ा।

फिर धीरे-धीरे अग्निमंदिर के उस रास्ते का उपयोग बंद हो गया। यातायात के नए साधनों का आविष्कार होने से लंबे कारोबारी सफर में ऊंटों का उपयोग कम होने लगा। आज यहां सिर्फ यह मंदिर और अखंड ज्योति मौजूद हैं, जो बीते कई जमानों की कहानी खामोशी से कह रहे हैं।