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भविष्य का दूसरा नाम है संघर्ष: आचार्य देवेन्द्रसागरसूरी
यदि इतना सत्य समझ लें तो क्या जीवन का हर पल आनंद से नहीं भर जाएगा
 
आज बोओगे, कल काटोगे, अर्थात जैसा वर्तमान आप बनाते हैं, उसी के अनुरूप आपका भविष्य अपने आप निर्मित हो जाता है।

बेंगलूरु/दक्षिण भारत। शहर के जयनगर के धर्मनाथ जैन मंदिर के परिसर में चातुर्मासार्थ विराजित आचार्यश्री देवेंद्रसागरसूरीजी ने कहा कि भविष्य का दूसरा नाम है संघर्ष। मन में आज जो इच्छा होती है, यदि वह पूर्ण नहीं हो पाती तो हमारा मन भविष्य की योजना बनाता है, भविष्य में इच्छा पूर्ण होगी इसकी कल्पना करता रहता है। किंतु जीवन न तो भविष्य में है, न ही अतीत में। 

जीवन तो इस क्षण का नाम है। अर्थात इस क्षण का अनुभव ही जीवन का अनुभव है। पर हम सब ये जानते हुए भी इतना सा सत्य समझ नहीं पाते हैं। या तो हम बीते हुए समय के संस्मरणों को घेर कर बैठे रहते हैं या फिर आने वाले समय के लिए योजनाएं बनाते रहते हैं और जीवन ऐसे ही बीत जाता है। एक सत्य यदि हम अपने मन में उतार लें कि न तो हम भविष्य देख सकते हैं ना ही भविष्य निर्मित कर सकते हैं। 

हम तो सिर्फ धैर्य और साहस के साथ आने वाले भविष्य का आलिंगन कर सकते हैं, स्वागत कर सकते हैं भविष्य का। यदि इतना सत्य समझ लें तो क्या जीवन का हर पल आनंद से नहीं भर जाएगा।  धूर्त लोग अनेक मिथ्या ग्रंथ बना कर लोगों को सत्य ग्रंथों से विमुख कर अपने जाल में फंसाकर अपना उल्लू सीधा करते हैं, भ्रमित करते हैं। 

आचार्यश्री ने आगे कहा कि हमारे ग्रंथ कर्म पर आधारित हैं, न कि भाग्य पर। एक कहावत प्रसिद्ध है, आज बोओगे, कल काटोगे, अर्थात जैसा वर्तमान आप बनाते हैं, उसी के अनुरूप आपका भविष्य अपने आप निर्मित हो जाता है। हमारे हाथों में केवल वर्तमान है, इसलिए केवल वर्तमान में ही रहें। कल की चिंता करना कठिनाइयों का कारण बनता है। 

यह संसार उल्टा पेड़ है। इसकी जड़ें ऊपर और शाखाएं नीचे हैं। यदि कुछ मांगना और प्रार्थना करनी है तो ऊपर करनी होगी, नीचे कुछ भी नहीं मिलेगा। आदमी का मस्तिष्क उसकी जड़ें है।

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