सद्गुरु की प्राप्ति परमभाग्य का सूचक

धारवा़ड। यहां चिंतामणि शीतलनाथ जैन श्वेतांबर मूर्तिपूजक संघ के तत्वावधान मंे सोमवार को अपने प्रवचन में आचार्यश्री महेन्द्रसागरसूरीश्वरजी ने कहा कि निरोगी शरीर संपदा प्राप्त होना यह सबसे प्राथमिक सुख है। उन्होंने कहा कि व्यक्ति के पास संपत्ति का, सत्ता और स्वजनों का सुख चाहे कितना ही अच्छा हो लेकिन स्वास्थ्य सुख अगर न हो तो वह सब सुख बौने लगते हैं। आचार्यश्री ने कहा कि निरोग शरीर मिलना यह भाग्य है, खानदानी कुल की प्राप्ति होना सौभाग्य है और अच्छे मित्र की प्राप्ति होना सद्भाग्य है लेकिन इन तीनों से भी उत्तम बात है सद्गुरु की प्राप्ति। उन्होेंने कहा कि सद्गुरु की प्राप्ति का होना परमसौभाग्य कहलाता है। आचार्यश्री महेन्द्रसागरजी ने कहा कि पारसमणि के स्पर्श से लोहा जैसे स्वर्ण में परिवर्तित हो जाता है वैसे ही सद्गुरु के संग से पापी भी पावन बन जाता है। उन्होंने यह भी कहा कि सद्गुरु की प्राप्ति जिन्हें होती है वे धन्यातिधन्य हैं क्योंकि सद्गुरु का मिलना सरल भी नहीं है। बिना सद्गुरु के हम अपनी आत्मा को पावन नहीं बना सकते, ना ही कल्याण कर सकते हैं। पापरुपी शल्यों को दूर करने के लिए सद्गुरु के योग को जरुरी बताते हुए आचार्यश्री ने कहा कि जो अपने आपको गुरु के चरणों में समर्पित करता है उसका आत्मकल्याण आसान है।