चेन्नई। द्रवि़ड मुन्नेत्र कषगम (द्रमुक) ने मंगलवार को विधानसभा में एक ऐसा विधेयक पेश किया, जिसके पारित होने की उम्मीद बहुत ही कम की जाती है। इसके बावजूद इसके पारित होने में किसी प्रकार की रुकावट नहीं आई। इस विधेयक में द्रमुक के उम्रदराज हो चुके सुप्रीमो एम करुणानिधि को चालू विधानसभा सत्र में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने से छूट देने का प्रस्ताव था। इसे सदन ने पूरी शालीनता और सर्वदलीय मैत्री का परिचय देते हुए एकमत से पारित कर दिया। यहां तक कि हर मुद्दे पर द्रमुक का तीव्र विरोध करनेवाले अखिल भारतीय अन्ना द्रवि़ड मुन्नेत्र कषगम (अन्नाद्रमुक) विधायकों ने भी अपना समर्थन दिया। यह विधेयक आज सदन की कार्यवाही के दौरान द्रमुक के कार्यकारी अध्यक्ष और विधानसभा में विपक्ष के नेता एमके स्टालिन ने प्रस्तुत किया। विपक्ष के उप नेता दुरई मुरुगन ने इसका समर्थन किया।सदन को इस विधेयक की जानकारी देते हुए स्टालिन ने कहा कि खराब स्वास्थ्य और चिकित्सकों की सलाह के मुताबिक करुणानिधि मौजूदा विधानसभा के १५वें सत्र में उपस्थित होने में असमर्थ हैं। उन्होंने करुणानिधि को सत्र में उपस्थिति दर्ज करने से छूट देने की अपील की। सदन ने इस प्रस्ताव का एकमत से अनुमोदन कर दिया। इसके बाद द्रमुक ने मेडिकल और इंजीनियरिंग पाठ्यक्रमों में दाखिले के लिए आयोजित नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेन्स टेस्ट यानी नीट का मुद्दा उठाया। स्टालिन ने राज्य सरकार से आग्रह किया कि इस विषय में केंद्र सरकार पर इस बात का दबाव बनाए कि वह नीट के खिलाफ राज्य विधानसभा में पारित विधेयक को राष्ट्रपति की मंजूरी दिलाए्। स्टालिन ने शून्यकाल में इस मुद्दे को उठाते हुए कहा कि अन्नाद्रमुक ने केंद्र पर दबाव बनाने का मौका खो दिया है। अगर राष्ट्रपति चुनाव से पहले सरकार ने दबाव बनाया होता तो केंद्र इसे मानने को तैयार हो सकता था। उन्होंने कहा कि उपराष्ट्रपति चुनाव के मद्देनजर अब भी इस दबाव की गुंजाइश बनी हुई है।इसके उत्तर में स्वास्थ्य मंत्री विजयभास्कर ने कहा कि वह एक प्रतिनिधिमंडल के साथ केंद्र से बातचीत के लिए बुधवार को ही दिल्ली रवाना होंगे। उनका लक्ष्य इस विधेयक को राष्ट्रपति की मंजूरी दिलाने के लिए केंद्र सरकार पर दबाव बनाना ही है। उन्होंने इसके साथ ही जो़डा कि राज्य सरकार ने राज्य शिक्षा बोर्ड के पाठ्यक्रम के तहत बोर्ड के स्कूलों से १२वीं की प़ढाई पूरी करने वाले विद्यार्थियों को नीट परीक्षा के बाद ८५ प्रतिशत आरक्षण देने के शासनादेश पर हाईकोर्ट की एकल खंडपीठ द्वारा लगाई गई रोक के आदेश को चुनौती दी है। बहरहाल, इस मुद्दे पर द्रमुक और अन्नाद्रमुक के सदस्यों के बीच तीखी बहस होने लगी, जिसके बाद द्रमुक के विधायकों ने सदन की कार्यवाही का बहिष्कार कर दिया।