बैंकों के निजीकरण का एआईएनबीओएफ ने किया विरोध, हड़ताल से कामकाज ठप

प्रतीकात्मक चित्र। स्रोत: PixaBay
प्रतीकात्मक चित्र। स्रोत: PixaBay

चेन्नई/दक्षिण भारत। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के निजीकरण के विरोध में दो दिवसीय हड़ताल के पहले दिन सोमवार को कामकाज बंद रहा। इसी क्रम में अखिल भारतीय राष्ट्रीयकृत बैंक अधिकारी महासंघ (एआईएनबीओएफ) ने बैंकों के निजीकरण को लेकर भारत सरकार के कदम का विरोध किया।

महासंघ ने बताया कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने पूरे देश में दूरदराज के स्थानों में शाखाएं खोली हैं। इन बैंकों की लगभग 28,800 ग्रामीण स्थानों पर और 24,599 अर्ध शहरी जगहों पर जनता की जरूरतें पूरा करने के लिए उपस्थिति है। यहां लगभग 93 प्रतिशत बैंक शाखाएं क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों सहित सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का प्रतिनिधित्व करती हैं।

महासचिव जीवी मनिमारन ने बताया कि बैंकिंग क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और यह अपनी कई सीमाओं के बावजूद राष्ट्र के विकास में योगदान देता है। देश के विकास के लिए राष्ट्रीयकृत बैंकों ने निस्वार्थ सेवा की है। मार्च 2020 तक कृषि और संबद्ध गतिविधि के लिए सकल बैंक ऋण 12,39,575 करोड़ रुपए है। उद्योगों को बैंक का क्रेडिट 3,2,52,801 करोड़ रुपए है।

महासंघ ने कहा कि जनधन योजना के तहत खाता खोलने के लिए सरकार के आह्वान पर, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों सहित सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने 41.93 करोड़ खातों में से लगभग 40.68 करोड़ खाते खोले थे। उक्त परिप्रेक्ष्य में राष्ट्रीयकृत बैंकों का योगदान पीएमजेडीवाई के तहत खोले गए कुल खातों का 97 प्रतिशत है।

महासंघ ने कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र द्वारा किए जा रहे सभी अच्छे कार्यों पर निजीकरण का नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा क्योंकि पीएसबी ने सामाजिक, आर्थिक उत्थान को लाभ के ऊपर रखा है, जबकि निजी संस्थाओं के साथ ऐसा नहीं होता। निजीकरण का लाभ कुछ कॉर्पोरेट और निजी संस्थाओं को मिलेगा। इससे देश की अधिकांश आबादी को मुख्यधारा की बैंकिंग से बाहर रखा जा सकता है।