‘दिन को रात में बदल दिया गया’ तो वेलुमणि को क्लीन चिट स्वीकार्य नहीं: उच्च न्यायालय

प्रतीकात्मक चित्र। फोटो स्रोत: PixaBay
प्रतीकात्मक चित्र। फोटो स्रोत: PixaBay

चेन्नई/दक्षिण भारत। मद्रास उच्च न्यायालय ने सोमवार को पूर्व स्थानीय प्रशासन मंत्री एसपी वेलुमणि के खिलाफ सतर्कता और भ्रष्टाचार निरोधक निदेशालय (डीवीएसी) की क्लीन चिट रिपोर्ट को स्वीकार करने से इन्कार कर दिया। न्यायालय ने कहा कि अगर उसे लगता है कि ‘दिन को रात में बदल दिया गया है’ तो वह क्लीन चिट रिपोर्ट को स्वीकार नहीं कर सकता है।

मुख्य न्यायाधीश संजीब बनर्जी और न्यायमूर्ति सेंथिलकुमार राममूर्ति की पहली पीठ ने कहा कि अगर कार्रवाई के लिए कड़े आरोप हैं तो ही हम हस्तक्षेप करेंगे। यदि केवल छोटी-छोटी बातें हैं, तो इसमें न्यायालय को कोई दिलचस्पी नहीं है।

पीठ ने यह भी कहा कि अगर सरकार ने रिपोर्ट स्वीकार कर ली है, तो न्यायालय हस्तक्षेप नहीं करेगा, लेकिन अगर ‘दिन को रात में बदल दिया गया’ है, तो न्यायालय इसे स्वीकार नहीं करेगा।

क्या है मामला?
यह मामला चेन्नई और कोयंबटूर निगमों के निविदा आवंटन में कथित भ्रष्टाचार को लेकर वेलुमणि के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने और एक विशेष जांच दल (एसआईटी) द्वारा जांच का आदेश देने के लिए एनजीओ अरप्पोर अयक्कम द्वारा दायर एक जनहित याचिका से संबंधित है।

क्या बोले वेलुमणि के वकील?
न्यायालय में वेलुमणि की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कहा कि राज्य सरकार ने एक बार डीवीएसी की रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया है, और कुछ नहीं बचा है। उच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त एक पुलिस अधीक्षक रैंक के अधिकारी द्वारा प्रारंभिक जांच की गई थी। इस पर पीठ ने कहा, ‘यह सरकार है जिसने रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया है, न्यायालय ने रिपोर्ट को स्वीकार नहीं किया होगा।’

याचिकाकर्ता की ओर से दलील
याचिकाकर्ता का प्रतिनिधित्व करते हुए, अधिवक्ता वी सुरेश ने प्रस्तुत किया कि याचिकाकर्ता ने डीवीएसी रिपोर्ट के खिलाफ कई काउंटर दायर किए हैं। चूंकि वह एक भौतिक सुनवाई में अपनी बात रखना चाहता था, इसलिए अदालत ने चार सप्ताह के बाद याचिका को स्थगित कर दिया।

अब तक क्या हुआ?
न्यायालय ने 26 मार्च को वेलुमणि की याचिका को खारिज कर दिया था जिसमें एनजीओ के खिलाफ अदालत की अवमानना कार्रवाई की मांग की गई थी। वेलुमणि ने आरोप लगाया कि चेन्नई और कोयंबटूर निगमों के ठेके देने में उन पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाने वाली खबरें एनजीओ द्वारा अदालत के एक आदेश का उल्लंघन करते हुए लगातार सोशल मीडिया में प्रकाशित की जा रही हैं।