एक कविता चिंता के साथ

कवि कैलाश मण्डेला
कवि कैलाश मण्डेला

देश के जाने माने कवि, पैरोडीकार डॉ. कैलाश मंडेला दक्षिण भारत के सबसे लोकप्रिय हिन्दी दैनिक “दक्षिण भारत राष्ट्रमत” के स्तंभ लेखक हैं। रोज मुखपृष्ठ पर ज्वलंत विषयों पर टिप्पणी करती उनकी 8 पंक्तियां पाठक को सोचने समझने को बाध्य कर देती हैं।

सशक्त लेखनी के धनी कैलाश मंडेला की एक संपूर्ण कविता आज हम पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं जो आज के हालात पर हमें बहुत कुछ सोचने और करने का संदेश देती है। वे स्वयं कहते हैं… जब पूरा विश्व आज महामारी के आतंक से जूझ रहा है तो हर व्यक्ति की जिम्मेदारी है कि वह अपने-अपने स्तर पर इस विभीषिका के विरुद्ध अपने दायित्वों का निर्वहन करे।

मैं एक कवि व लेखक हूं और कवि तो युग चेता होता है। मेरी जिम्मेदारी को समझते हुए प्रतिदिन मैं अपनी विविध रचनाएं वैचारिक जागरण के निमित्त सोशल मिडिया के विभिन्न माध्यम से भी भेजता हूं।

मेरे इस मिशन का उद्देश्य है कि अधिकाधिक लोग मेरी रचनाएं पढ़ें और इन रचनाओं के भावों से प्रेरित हों। देशभर से प्रतिदिन जाने और अनजाने व्यक्तियों की प्रतिक्रियाएं मेरे पुरुषार्थ की सफलता को उजागर करती हैं। आज एक कविता यहां प्रेषित है।

भट्ठियां श्मशान की

काल की सब शक्तियां संभवतया अब जग गई हैं।
भट्ठियां श्मशान की फिर से पिघलने लग गई हैं।।

नृत्य करती भैरवी उन्मुक्त है कपालिनी।
तीक्ष्ण नख वाली पिशाची डाकिनी बलशालिनी।
चीख क्रंदन वेदनाएं द्वार दस्तक दे रहीं,
रौद्र रूपाली बनी है प्रीत की मधुमालिनी।
जिन्दगी मानो सलीबों पर सभी की टँग गई है।।

संक्रमित है व्योम दूषित पवन उसमें घुल रहा।
पीढ़ियों का पाप अपने रक्त से ही धुल रहा।
कौन अपराधी यहां हर व्यक्ति अब चिन्तन करे,
आदमी की तरक्की का भेद छद्मी खुल रहा।
स्वयं पोषित वर्जनाएं स्वयं को ही ठग गई हैं।।

सृष्टि के संकेत को क्यों कर रहे विस्मृत कहो।
सत्य से आँखें चुराए कह रहे अनृत कहो।
हो तुम्हीं दोषी करो स्वीकार अंतःकरण में,
भूमि से है लुप्त किस कारण यहां अमृत कहो।
कल्पना की तितलियां अब स्याहियों में रँग गई हैं।

इस तमस की भयावहता से सभी का मन डरा।
अश्रुओं की इस नदी के वेग को रोको जरा।
उठो सोचो वक्त कम है शंख फूंको जाग का,
एकजुटता से सभी इन संकटों को दो हरा।
वेदनाएं प्राण में रम प्रार्थना में पग गई हैं।।

रचयिता-कैलाश मण्डेला
संपर्क-9828233434