जलवायु परिवर्तन: अब नहीं जागे तो ​कब?

प्रतीकात्मक चित्र। स्रोत: PixaBay
प्रतीकात्मक चित्र। स्रोत: PixaBay

जलवायु परिवर्तन सिर्फ विकसित देशों की समस्या अथवा कोरी किताबी बात नहीं है। कुछ साल पहले तक लोग इस पर यकीन करने से इन्कार करते थे। दुनिया में पहले से ही इतनी समस्याएं हैं, अब यह जलवायु परिवर्तन क्या बला है? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इस मुद्दे को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों से उठाते रहे हैं। उनके द्वारा आईआईटी खड़गपुर के 66वें दीक्षांत समारोह को संबोधित करते समय यह कहा जाना प्रासंगिक है कि ‘दुनिया जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से जूझ रही है। ऐसे में भारत ने दुनिया का ध्यान आपदा प्रबंधन के मुद्दे पर दिलाया है। आपने देखा कि हाल में उत्तराखंड में क्या हुआ? हमें आपदा सहने में सक्षम आधारभूत ढांचे को बेहतर बनाने पर ध्यान देना चाहिए जो प्राकृतिक आपदाओं के प्रभावों को बर्दाश्त कर सके।’

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर जलवायु परिवर्तन इसी तरह जारी रहा तो इसके परिणाम हिमालय को प्रभावित कर सकते हैं, जो कालांतर में भयानक हो सकते हैं। यह परिवर्तन खेती को प्रभावित कर सकता है, जो दुनियाभर में करोड़ों किसानों की आय का मुख्य स्रोत है। अगर इसके चक्र में परिवर्तन हुआ तो इससे न केवल उत्पादन प्रभावित होगा, बल्कि अन्न की पौष्टिकता का ह्रास हो सकता है। जलवायु परिवर्तन पर आधारित एक रिपोर्ट इसके परिणामों की ओर इशारा करते हुए संभलने की चेतावनी दे चुकी है। इसके मुताबिक, उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों के बाद सबसे अधिक बर्फ का इलाका होने के कारण हिमालय को तीसरा ध्रुव भी कहा जाता है। हिमालय में प्रचुर जैव विविधता है। यहां 10 हजार से अधिक पादप प्रजातियां मौजूद हैं। यहां जलवायु परिवर्तन के दूरगामी परिणाम हो सकते हैं।

इस संबंध में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय की एक रिपोर्ट में यह कहते हुए चिंता जताई गई थी कि गंगा के विस्तृत मैदानी इलाके में मानवीय गतिविधियों से पैदा हो रहा प्रदूषण हिमालयी पर्यावरण को बहुत नुकसान पहुंचा रहा है। हिमालय के विभिन्न क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों की दर अलग-अलग सामने आ रही है। पश्चिम हिमालय में पूर्वी हिमालय की तुलना में ग्लेशियरों पर अधिक प्रभाव दिखाई दे रहा है। हिमालय के 50 से भी अधिक ग्लेशियर सिकुड़ रहे हैं। इसका असर हिमालयी वनस्पतियों के वितरण, ऋतु जैविकी पर दिखने लगा है। ऐसा नहीं है कि जलवायु परिवर्तन उच्च हिमालयी क्षेत्रों और वहां स्थित वनों को ही प्रभावित कर रहा है। इसकी चपेट में निचले हिमालयी क्षेत्रों में फसली पौधे आ रहे हैं। यहां के किसान स्वीकार कर चुके हैं कि हाल के वर्षों में उनके यहां सेबों की कम पैदावार हुई। इससे कमाई घट रही है। अगर भविष्य में उपज कम हुई तो उन्हें रोजगार का कोई और जरिया तलाशना होगा।

नवंबर 2019 में संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन को जीवन की निरंतरता के लिए सबसे बड़ा खतरा बता चुका है। उसके मुताबिक, जलवायु परिवर्तन से उपजीं ​परिस्थितियों में जब समुद्र के जलस्तर में वृद्धि होगी तो भारत उन देशों में होगा जो इससे सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे। उसके साथ बांग्लादेश, चीन और जापान हैं। यही नहीं, अगर इस रुझान को नहीं बदला गया तो साल 2050 से पहले ही 30 करोड़ लोगों के सामने डूबने या विस्थापित होने का खतरा मंडराने लगेगा। इससे सबसे ज्यादा दक्षिण-पूर्वी एशिया प्रभावित होगा। अकेले थाईलैंड का वह भूभाग डूब सकता है जहां उसकी 10 प्रतिशत आबादी रहती है। मालदीव जैसे देश के सामने तो अस्तित्व बचाए रखना सबसे बड़ी चुनौती होगी। अगर पर्यावरण प्रदूषित होगा, धरती का तापमान बढ़ेगा तो पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों के साथ मनुष्य भी इसकी चपेट में आएगा। ऐसे में सरकारों एवं आमजन की प्राथमिकता में यह शामिल होना चाहिए कि पर्यावरण प्रदूषण का स्तर कम किया जाए, प्रकृ​ति का अतिदोहन रुके, उसके साथ संतुलन स्थापित किया जाए, जीवों पर दया की जाए। धरती सिर्फ मनुष्य के रहने के लिए नहीं बनाई गई है।

हमारे पूर्वज चींटी से लेकर गाय, वृक्ष, नदी, समुद्र तक में देवत्व मानते थे। जब तक यह संवेदना, मर्यादा रही, धरती का तापमान संतुलित रहा। आज जब मनुष्य बेपरवाह होता जा रहा है, अपनी जड़ों से दूर होता जा रहा है, उसकी प्राथमिकता में ‘मैं और मेरा’ ही रह गए हैं तो उसे प्रकृति के कोप का सामना करना पड़ रहा है, कभी अकाल, कम वर्षा, अतिवर्षा, कम उपज तो कभी महामारी के रूप में। मनुष्य को इस पर गंभीरता से विचार करना होगा कि ​आज वह जिस राह पर है, वह उसे आगे कहां लेकर जाएगी! अभी सोचने का वक्त है, जरूर सोचिए।