भोजन की बर्बादी कब तक?

प्रतीकात्मक चित्र। स्रोत: PixaBay
प्रतीकात्मक चित्र। स्रोत: PixaBay

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) की हालिया रिपोर्ट हम सबके लिए विचारणीय है। इस समय जहां दुनिया में असंख्य लोगों का सबसे बड़ा सपना यही है कि किसी तरह दो वक्त की रोटी मिल जाए, वहीं 93.10 करोड़ टन खाना हर साल बर्बाद हो रहा है। इससे कितने ही लोगों का पेट भर सकता है! भारत के लिए यह आंकड़ा हर साल प्रति व्यक्ति 50 किलोग्राम है। हमारे पड़ोसी देशों में भी हालात ऐसे नहीं हैं कि उनकी सराहना की जाए।

इसमें अफगानिस्तान, पाकिस्तान, नेपाल, श्रीलंका सब शामिल हैं। हर कहीं खाने की बर्बादी हो रही है और जमकर हो रही है। अगर इसकी एक मिसाल देखनी हो तो विवाह स्थलों में जाकर देख लें। मेहमान जूठी प्लेट में कितना खाना छोड़ देते हैं। इसमें काफी दोष नए चाल-चलन का भी है। इधर, खाना तैयार हुआ नहीं कि लोग प्लेट लेकर टूट पड़ते हैं। पलक झपकते ही सामाजिक अनुशासन तार-तार हो जाता है।

हर कोई सोचता है कि फिर कौन लाइन में धक्के खाने आएगा, जितना ले सकता हूं, अभी ले चलूं! इसी जोरआजमाइश में मिठाई, सब्जी, पूरी आदि का प्लेट में ढेर लग जाता है। फिर इन सबसे दो-दो हाथ करने का मुकाबला शुरू होता है। इस दौरान खड़े रहना जरूरी होता है। अगर कहीं सुकून से खाने के लिए बैठ गए तो लोग कहेंगे कि ‘देखो, यह तो पुराने जमाने का है। इसे आधुनिक समाज में खाना खाने का तरीका नहीं आता।’

हमारे ऋषियों ने कई युगों पूर्व बताया था कि मनुष्य को बैठकर, शांतचित्त से भोजन करना चाहिए। यहां तक कि पात्र कैसा होना चाहिए, भोजन कितना करना चाहिए, कितना चबाना चाहिए, पेट कितना खाली रखना चाहिए, पानी कब पीना चाहिए … यह सब आयुर्वेद में है, जिन पर भारतीय समाज अमल करता रहा है।

जब से हमने पश्चिम की हर बात, हर व्यवहार को अंतिम सत्य के रूप में मानना शुरू कर दिया है, आज उसका परिणाम हमारे सामने है। लोग वर्षों मेहनत कर रुपया जोड़ते हैं, उधार लेते हैं, फिर भव्य सजावट करते हुए शादियों में दावतें देते हैं। ऊपर से यह डर कि खाना कम नहीं पड़ जाए वरना बेइज्जती हो जाएगी। भले ही वह जरूरत से इतना ज्यादा हो कि दूसरे दिन कूड़े में फेंकना पड़े। यह उस परिवार के साथ संपूर्ण समाज पर अत्याचार है।

जब अन्न का एक दाना खेत से लेकर थाली तक पहुंचता है तो उसकी कीमत सिर्फ रुपयों में नहीं आंकी जा सकती है। इस संपूर्ण प्रक्रिया में बहुत संसाधनों, परिश्रम का समावेश होता है। इस तरह खाने की बर्बादी करना समझदारी नहीं है। कुछ दशक पहले तक जब किसी शुभ प्रसंग में सामूहिक भोज होता था तो सभी एक पंक्ति में बैठते और पत्तल में ग्रहण करते। आज पत्तल की वह खुशबू लुप्त हो गई। उस पद्धति से एक फायदा यह होता था कि परोसने वाला खाने वाले की पत्तल में मौजूद सामग्री देखकर और सामग्री डालता था।

अब तो हर किसी के हाथ में प्लेट थमाकर मुनादी फरमा दी- ‘चाहे जितना लो, बाकी फेंक दो’। यह अन्न का अपमान नहीं तो क्या है? हममें से हर किसी ने अपने माता-पिता से अन्न को देवता कहते अवश्य सुना होगा। जब किसान खेत में बीज बोता है तो परमात्मा से प्रार्थना करता है कि सिर्फ मेरे लिए नहीं, चींटी, पक्षी, गाय, देवता, अतिथि, जरूरतमंद प्रत्येक के लिए अन्न देना। हमारे सनातन चिंतन में ‘मैं और मेरा’ नहीं हैं।

खुद का पेट भरते जाना और दूसरों की परवाह नहीं करना – यह देवत्व नहीं, आसुरी प्रवृत्ति है जिससे किसी का कल्याण नहीं हो सकता। हमने कोरोना लॉकडाउन में देखा कि जब किसी को भोजन का अभाव हुआ तो अनेक लोग आगे आए। उन्होंने खुद के पेट की परवाह किए बिना दूसरों तक निवाला पहुंचाया। जहां यह भाव होता है, वहां कोई संकट ज्यादा समय तक टिक नहीं पाता है। आज हमें इसी भाव को और सशक्त करने की आवश्यकता है ताकि अन्न का एक दाना भी बर्बाद न हो। उसका पूरा-पूरा सदुपयोग होना चाहिए।