अब शान की सवारी बने साइकिल

प्रतीकात्मक चित्र। स्रोत: PixaBay
प्रतीकात्मक चित्र। स्रोत: PixaBay

.. राजीव शर्मा ..

कोरोना महामारी ने हमें ज़िंदगी के तौर-तरीकों के बारे में फिर से सोचने को मजबूर कर दिया है। इन्सान ने अपना सफर पैदल से शुरू किया था और अब वह अत्याधुनिक विमानों के युग में प्रवेश कर चुका है। वहीं, ज्यादा से ज्यादा आराम, आसानी की लत ने उसे कई बीमारियां दे दीं। साथ ही पेट्रोल-डीजल की आसमान छूतीं कीमतों ने पसीना ला दिया है।

इन हालात के बीच एक चीज ऐसी है जो सेहत दुरुस्त रख सकती है और रोजमर्रा के लिए कुछ दूरी की यात्रा में भी फायदेमंद हो सकती है। यह है साइकिल। आज सरकार और आम नागरि​कों को इसे एक विकल्प के तौर पर फिर से अपनाने की जरूरत है।

साइकिल को ऐसा वाहन नहीं समझा जाना चाहिए जिसे कोई शख्स मजबूरी में चलाता है। हाल में सोशल मीडिया पर ऐसे कई राष्ट्र प्रमुखों की तस्वीरें वायरल हुई थीं जो साइकिल की सवारी करते दिखे। इनमें ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन भी शामिल हैं।

जून 2017 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक तस्वीर खूब वायरल हुई थी जिसमें वे साइकिल पर बैठे मुस्कुराते हुए नजर आए थे। उन्हें यह साइकिल नीदरलैंड के प्रधानमंत्री ने भेंट की थी, जो अक्सर साइकिल से दफ्तर आते थे। जापान, चीन, नॉर्वे, जर्मनी जैसे देशों में ऐसे कई उच्चाधिकारी, कर्मचारी हैं जो साइकिल से दफ्तर जाते हैं। वे इससे अपने सम्मान में कोई कमी महसूस नहीं करते।

क्या भारत में यह एक प्रभावशाली विकल्प बन सकती है? लॉकडाउन संबंधी अनुभवों पर आधारित एक रिपोर्ट में बताया गया था कि इस दौरान मई से आगामी पांच महीनों में ही साइकिल की बिक्री दोगुनी हो गई थी। कई शहरों में तो लोगों को पसंदीदा साइकिल खरीदने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ा था। भारत में वर्षों बाद ऐसा रुझान देखने को मिला।

साइकिल विनिर्माताओं के राष्ट्रीय संगठन एआईसीएमए ने बताया था कि मई से सितंबर 2020 तक पांच महीनों में देश में 41,80,945 साइकिल बिक चुकी थीं। इतना बड़ा आंकड़ा इस बात की ओर संकेत करता है कि देश में साइकिल को लेकर भरपूर संभावनाएं हैं, बस इसे प्रोत्साहित करने की जरूरत है।

भारत में प्राय: वाहन को सामाजिक प्रतिष्ठा से जोड़कर देखा जाता है, जो किसी लिहाज से उचित नहीं है। अगर कोई विमान से यात्रा करता है तो उसे बड़ा आदमी समझा जाता है। अगर खुद की कार हो तो सोने पे सुहागा। जो कार में बैठकर दफ्तर जाता है, उसे सम्मान का पात्र समझा जाता है।

अगर कोई स्कूटर या मोटर साइकिल चलाता है तो वह ज़िंदगी ‘काट’ रहा है। उसे ‘सुधार’ करने की जरूरत है। जबकि साइकिल से चलने वालों को एक अलग ही नजर से देखा जाता है। न उसके चलने के लिए सड़कों पर खास इंतजाम हैं और न उसे कोई वाहन साइड देने की सोच सकता है। हमारे यातायात संबंधी अनुशासन के तो क्या कहने! अगर कोई साइकिल खरीद भी ले और उससे दफ्तर चला जाए तो सहकर्मी ही चुटकी लेने से बाज़ नहीं आते। अगर उसकी आर्थिक स्थिति कमजोर हुई तो उसे ‘बेचारा’ घोषित कर दिया जाएगा। अगर वह संपन्न होगा तो कंजूस माना जाएगा। इस तरह दो-चार दिन में ही साइकिल का भूत उतर जाता है।

भारत में पर्याप्त अनुकूलता होने के बावजूद यहां साइकिल उतनी लोकप्रिय नहीं हो पाई जितनी होनी चाहिए थी। नीदरलैंड जो आर्थिक रूप से बहुत संपन्न है, वहां लोगों में कार से ज्यादा साइकिल लोकप्रिय है। इस देश की आबादी करीब 1.7 करोड़ है, जबकि यहां साइकिलों की संख्या 1.8 करोड़ से ज्यादा है। इसका फायदा इन लोगों को मिल रहा है। इन्हें अलग से जिम जाने की जरूरत नहीं होती। ये साइकिल चलाने से चुस्त रहते हैं। पेट्रोल पर खर्च होने वाली राशि बचती है। दुर्घटनाओं की आशंका बहुत कम होती है।

कोरोना काल में इटली की सरकार साइकिल बिक्री को प्रोत्साहित कर रही थी। लॉकडाउन के बाद घोषित प्रोत्साहन पैकेज में साइकिल के 60 प्रतिशत मूल्य पर 500 यूरो तक की बोनस छूट दी गई थी।

लंदन में स्थानीय निकाय ने फैसला किया था कि शहर के कुछ अंदरूनी इलाकों में कारों की आवाजाही पर पाबंदी लगा दी जाए ताकि इससे साइकिलों की निर्बाध आवाजाही को प्रोत्साहन मिले। कोरोना के कारण आर्थिक बदहाली का सामना कर रहे फिलिपींस में साइकिल यात्रा का मजबूत विकल्प बनकर उभरी।

इसी प्रकार अमेरिका में अप्रैल से जून 2020 के बीच साइकिलों की बिक्री में इतनी तेजी दर्ज की गई जो सत्तर के दशक में तेल संकट के बाद सबसे बड़ा उछाल था। लोग हैंड सेनिटाइजर के साथ साइकिल खरीदने को तरजीह दे रहे थे। जहां कभी कारें दनदनाती थीं, वहां साइकिलों के लिए अलग से लेन बनाई गईं। जर्मनी में सामाजिक कार्यकर्ता यह मांग करते हुए सड़कों पर उतरे कि अतिरिक्त साइकिल लेन बनाई जाएं। यूरोपीय साइकिल संघ के सह अध्यक्ष मॉर्टन काबेल कह चुके हैं कि यदि शहरों को सुचारु रूप से चलाना है तो हमें साइकिल के लिए अधिक उपयुक्त वातावरण बनाना होगा।

कोरोना काल में डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगेन ने एक मिसाल पेश की। यहां रोजाना आवागमन करने वाले लोगों में आधे से ज्यादा साइकिलों से सफर करने लगे। उनकी तस्वीरों ने दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा था। क्या भारत में यह मॉडल कामयाब हो सकता है? अब समय आ गया है कि हम भी साइकिल को अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बनाएं और पेट्रोल-डीजल पर देश की निर्भरता कम करें।