प्रदर्शनकारी किसान। फोटो स्रोत: यूएनआई का ट्विटर का अकाउंट।
प्रदर्शनकारी किसान। फोटो स्रोत: यूएनआई का ट्विटर का अकाउंट।

.. श्रीकांत पाराशर ..

किसान आंदोलन को 48 दिन हो गए। वे दिल्ली की विभिन्न सीमाओं पर हाइवे रोक कर बैठे हैं। यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि इससे आम लोगों को कितनी परेशानी हो रही होगी। हाइवे पर जगह जगह गांवों में छोटे मोटे व्यवसाय करने वालों का धंधा चोपट हो चुका है क्योंकि आवागमन लगभग थम चुका है। अनेक गांवों कस्बों के बीच से गुजरने वाली छोटी संकड़ी सड़कों से निजी वाहन गुजर रहे हैं, जिन्हें जरूरी रूप से दिल्ली जाना होता है। ये वाहन सामान्य दिनों में हाइवे से दिल्ली जाते हैं लेकिन मजबूरीवश अब गांवों के बीच से गुजर रहे हैं।

इन्होंने दर्जनों गांव वालों का जीना हराम कर रखा है। वाहनों के एक्सीडेंट हो रहे हैं, मकानों को ये वाहन नुकसान पहुंचा रहे हैं, भारी वाहनों से सड़कें टूट रही हैं। ये लोग किसानों के दुश्मन नहीं हैं बल्कि आंदोलनकारियों के भोजन पानी तक का इंतजाम करने की पेशकश कर रहे हैं परंतु कह रहे हैं कि रास्ता खोल दीजिए।

देशभर के लोग जानते हैं कि यदि वास्तविक किसान आंदोलन कर रहे होते तो जनता के प्रति सहानुभूतिपूर्ण रवैया रखते और शांतिपूर्ण ढंग से आंदोलन करते। हालांकि अभी स्थिति नियंत्रण में है क्योंकि सब संगठन तोड़फोड़ और हिंसा का साथ नहीं देना चाहते लेकिन कुछ अतिवादी वामपंथी विचारधारा वाले संगठन किसी न किसी बहाने हिंसा करने के मूड में हैं। वे बार बार किसानों को उकसा रहे हैं। अभी तक हालात काबू में हैं लेकिन तनाव बना हुआ है। इसीलिए सोमवार और मंगलवार की सुनवाई के बाद उच्चतम न्यायालय ने अपना अंतरिम फैसला सुनाया।

उच्चतम न्यायालय ने सरकार और किसानों का पक्ष धैर्य से सुना और कई सख्त टिप्पणियों के साथ अंतरिम फैसला सुनाते हुए कहा कि फिलहाल किसान कानूनों को लागू करने पर रोक लगाई जाती है। न्यायालय ने कहा हम अभी कानूनों की संवैधानिकता की मैरिट की समीक्षा नहीं कर रहे, बल्कि लागू करने पर रोक लगा रहे हैं ताकि दोनों पक्षों के बीच एक सौहार्दपूर्ण माहौल निर्मित हो।

न्यायालय ने चिंता जतातज हुए कहा कि देश में हिंसात्मक घटनाओं की आशंका बढती जा रही है, आंदोलन उग्र होता जा रहा है। सरकार ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि किसानों को भड़काया जा रहा है, कुछ विवादित संगठन भी इसमें घुस गए हैं जो देश में अराजकता चाहते हैं। मुख्य न्यायाधीश बोबड़े ने कहा कि न्यायालय चार सदस्यीय समिति गठित कर रहा है। जिन्हें न्याय चाहिए, समाधान चाहिए वे समिति के समक्ष बेझिझक अपना पक्ष रखें। यह समिति न्यायालय की निगरानी में काम करेगी और रिपोर्ट देगी फिर इस विषय में निर्णय लिया जाएगा।

न्यायालय के फैसले के बाद कुछ किसान संगठनों के नेताओं ने कहा कि वे सभी संगठनों की कोर कमेटी से चर्चा करने के बाद निर्णय लेंगे वहीं अनेक नेताओं ने कहा कि वे किसी कमेटी के पास अपनी बात नहीं रखेंगे, उनका किसी भी समिति पर कोई भरोसा नहीं है। वे कानून वापस लेने से कम पर कुछ बात नहीं करेंगे। न्यायालय ने साफ कर दिया कि किसानों को समिति से बात करनी होगी, यदि समाधान चाहिए तो। बात नहीं करेंगे यह नहीं चलेगा। उन्होंने यह भी कहा कि आंदोलन में बच्चों, महिलाओं, वृद्ध लोगों की उपस्थिति ठीक नहीं है। इसलिए आंदोलनकारी यह सुनिश्चित करें की उनकी घर वापसी हो।

उच्चतम न्यायालय ने यह भी कहा कि किसान संगठन पुलिस से अनुमति लेकर किसी ऐसे स्थान पर धरना करें जहां आमजन को परेशानी न हो। सड़कों पर अनिश्चितकाल तक धरना नहीं दिया जा सकता। कुल मिलाकर यह एक संतुलित और समझदारी भरा फैसला सुनाया गया है। सुनवाई के पहले दिन सोमवार को सरकार के प्रति नाराजगी भी जाहिर की क्योंकि अभी तक समाधान खोजने में सरकार नाकाम रही। बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट से ऊपर त़ कोई नहीं है। अब यदि न्यायालय द्वारा गठित समिति के समक्ष किसान अपना पक्ष नहीं रखते हैं तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि उनके पास कोई तथ्यात्मक बात है ही नहीं।

केंद्र सरकार ने भी समिति बनाने की पेशकश की थी, कानून के एक एक बिंदू पर विस्तार से चर्चा करने की पेशकश की थी, हर संभव संशोधन करने की पेशकश की थी परंतु किसानों ने हर पेशकश ठुकरा दी। उनके अड़ियल रवैये में यह साफ दिखाई दे रहा था और अभी भी दिखाई दे रहा है कि कुछ ऐसी ताकतें उनके बीच विद्यमान हैं जो वार्ता और समाधान बिल्कुल नहीं चाहती हैं। इनमें मोदी विरोधी विपक्षी दल भी शामिल हैं।

सत्ता हथियाने की छटपटाहट में ये दल मोदी विरोध करते करते देशविरोधी होते जा रहे हैं। वर्तमान में जो किसान आंदोलन चल रहा है वह देश की आर्थिक स्थिति को कमजोर करने वाला एवं विकास की रफ्तार में अवरोधक साबित होने वाला है। सरकार के पक्ष की तुलना किसानों से करने वालों को यह गौर करना होगा कि सरकार अड़ियल होती तो हर संशोधन को तैयार क्यों होती लेकिन सरकार ने बार बार बात से समाधान खोजने का प्रयास किया और किसान केवल एक ही रट लगाए रहे कि काले कानून वापस लो।

वे यह भी नहीं बता पा रहे कि किसान हितों के लिए बनाए गए कानून काले कैसे हैं और अगर काले हैं तो देशभर के किसान विरोध क्यों नहीं कर रहे? केवल मुट्ठीभर किसान ही सड़कों पर क्यों उतरे हैं? साफ है कि किसानों के भेष में बड़ी संख्या में कृषि बाजार से जुड़े बड़े व्यापारी, आढतिये, दलाल और राजनीतिक दलों एवं विवादित संगठनों के कार्यकर्ता सक्रिय हैं। इनमें अलगाववादी विचारधारा और देशविरोधी मंशा वाले दुष्ट लोग भी शामिल हैं क्योंकि मोदी सरकार आने के बाद से ये सब मनमानी करने के लिए तड़प तो रहे हैं परंतु कर कुछ नहीं पा रहे। उच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद आंदोलनकारियों को भगवान अब सद्बुद्धि देंगे ताकि समस्या का समाधान निकाला जा सके।