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कोरोना काल से क्या सीखा?
 
कोरोना काल से क्या सीखा?
प्रतीकात्मक चित्र। फोटो स्रोत: PixaBay

कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए देश में पहली बार लगाए लॉकडाउन को एक साल हो गया है। इस अवधि में कई अनुभव हुए। बहुत सख्त आजमाइश का दौर रहा। कई लोगों ने रोजगार गंवाए, तो कई ने ज़िंदगी। उन्हें सौभाग्यशाली ही कहा जाएगा जो इस वायरस से सुरक्षित रहे या इसके संक्रमण के बावजूद स्वस्थ हो गए।

चाहे परिवार हो या देश, हमें इस बात पर जरूर गौर करना चाहिए कि हमने इस कोरोना काल से क्या सीखा। कोरोना दुनिया का पहला वायरस नहीं है और न ही यह महामारी दुनिया की आखिरी महामारी है। सालभर पहले जीवन एक ढर्रे पर चल रहा था और हम यही मानकर चल रहे थे कि हमेशा ऐसा ही चलता रहेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

कोरोना के मामले बढ़ने लगे तो बहुत लोगों को इसे स्वीकार करने में ही काफी समय लगा कि देश में सचमुच कोरोना आ गया है। पहले उनका कहना था कि कोरोना वायरस भारत में नहीं आ सकता, चूंकि यह चीन की बीमारी है, जो चीनियों ने विचित्र खानपान से फैलाई है।

वायरस ने इस मान्यता का कोई लिहाज नहीं किया और हमारे देश में आ धमका। हम घरों में कैद होने को मजबूर हुए, क्योंकि इससे बचने का और कोई उपाय नहीं था। अब एक साल बाद भारत की उपलब्धियों पर बात करें तो हमारे पास वैक्सीन है, रोजगार के अवसर मिलने लगे हैं और अर्थव्यवस्था दोबारा रफ्तार पकड़ती दिख रही है। हालांकि हाल में कोरोना के मामलों में फिर उछाल दिखाई दिया है जो चिंता का विषय है।

कोरोना काल ने हमें कई सबक दिए हैं। सबसे पहले, स्वच्छता का महत्व सिखाया है। हाथ धोने की आदत जीवन का हिस्सा बन गई है। यह सिखाया कि इंसान के गुजारे के लिए अथाह संसाधनों की कोई आवश्यकता नहीं है। वह सीमित या संतुलित संसाधनों से भी गुजारा कर सकता है।

शादियों में फिजूलखर्ची, दिखावे को बड़े-बड़े समाज सुधारक दूर नहीं कर पाए, परंतु अतिसूक्ष्म आकार के एक वायरस ने इन पर लगाम लगा दी। कई लोगों ने तो इसीलिए कोरोना काल में शादियां कीं क्योंकि सबकुछ बहुत आसानी से हो रहा था। उन्होंने सादगी से कार्यक्रम कर एक मिसाल पेश की।

जरा याद कीजिए बचपन की वो गुल्लक, जब कभी मां कोई सिक्का देती तो हम उसमें इकट्ठा करते थे। कोरोना काल ने बचत का महत्व बहुत अच्छी तरह से समझा दिया। जिन लोगों ने अपनी कमाई से कुछ बचत कर रखी थी, उन्होंने यह मुश्किल समय स्वाभिमान के साथ गुजार लिया।

‘खाओ-पीओ-मौज करो, भविष्य में जो होगा, देखी जाएगी’ – के सिद्धांतों पर चलने वालों को यह जरूर महसूस हुआ होगा कि मौज-मस्ती का समय कब लुप्त हो जाए, कहा नहीं जा सकता। इसलिए परिवार के सदस्यों में बचत की प्रवृत्ति का होना बहुत जरूरी है।

पश्चिम की महानगरीय संस्कृति के अंधानुकरण में हमने उनकी कई नकारात्मक चीजें भी अपना ली हैं। इससे घरों में सालभर का अनाज रखने की परंपरा खत्म हो गई थी। गांवों में जब घर बनाए जाते थे, चाहे वह कच्ची झोपड़ी ही क्यों न हो, तब अनाज रखने के खास इंतजाम किए जाते थे। प्राचीन सभ्यताओं की खुदाई में ऐसे अनेक प्रमाण मिले हैं जो सिद्ध करते हैं कि वे लोग भी अनाज का संग्रह करके रखते थे। कोरोना काल ने हमें अन्न का महत्व समझा दिया। उसका आदर करना सिखा दिया।

वास्तव में अब हमें जीवन में प्राचीन और आधुनिक दोनों युगों के संगम के साथ आगे बढ़ना होगा। यह कैसे होगा, क्या यह संभव है? बिल्कुल संभव है। हमें प्राचीन युग की उन तमाम अच्छी बातों को जीवन में स्थान देने की आवश्यकता है जो हमारे ऋषि-मनीषियों के दर्शन का सार हैं।

वहीं, आधुनिक युग में विज्ञान एक बड़ी शक्ति है। हमें इसका सदुपयोग करते हुए भविष्य की राह तैयार करनी होगी। हमने देखा कि किस तरह इंटरनेट ने जीवन की रफ्तार पूरी तरह थमने नहीं दी। विज्ञान की शक्ति ने ही कोरोना की वैक्सीन दी है। दोनों युगों की अच्छाइयों का संगम ही हमें शक्तिशाली बनाकर इस महामारी और उसके प्रभावों पर विजय पाने में सक्षम बना सकता है।