आज भी रंगभेद क्यों?

प्रतीकात्मक चित्र। स्रोत: PixaBay
प्रतीकात्मक चित्र। स्रोत: PixaBay

अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस जैसे देश जिन्हें आधुनिकता, मानवाधिकार, समानता, लोकतंत्र का चमकता नाम माना जाता है, वहां रंगभेद का लंबा इतिहास रहा है। दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति रहे नेल्सन मंडेला ने तो अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा इस बुराई के खिलाफ संघर्ष करते हुए जेल में बिता दिया था। क्या कोई इन्सान इस आधार पर ही दूसरों से श्रेष्ठ कहलाने का अधिकारी हो सकता है कि चूंकि वह गोरा है?

आज हममें से हर कोई यही कहेगा कि नहीं, किसी भी रंग का होने मात्र से कोई श्रेष्ठ नहीं होता। उसके गुण, योग्यता ही महत्व रखते हैं। बात सैद्धांतिक रूप से भले ही सही लगती हो, लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अलग है। आज भी गोरे रंग को हर रंग पर वरीयता दी जाती है। इसे सुंदरता का प्रतीक माना जाता है।

भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और इनके पड़ोसी देशों की बात तो छोड़ें, जहां गरीबी इतनी ज्यादा है, रूढ़ियों की पकड़ गहरी है; यूरोप सहित पश्चिमी देशों का वह समाज भी इस मानसिकता से पूर्णत: मुक्त नहीं हुआ है। इसका असर शिक्षा, शोध और अन्य क्षेत्रों में दिखाई देता है। इस मानसिकता ने एक खास किस्म की छवि बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

अगर किसी विषय पर अमेरिका में शोधपत्र प्रस्तुत किया जाए और शोधकर्ता का रंग गोरा, उसकी भाषा अंग्रेजी हो तो हमारा समाज यह स्वत: स्वीकार कर लेगा कि गोरे ने अंग्रेजी में कोई बात कही है तो ठीक ही कही होगी।

अगर उसी विषय पर शोधपत्र हिंदी या किसी अन्य भारतीय भाषा में प्रस्तुत किया जाए और शोधकर्ता भारतीय मूल का हो, उसकी त्वचा का रंग सांवला हो तो समाज उसे वह स्वीकृति देने में हिचकिचाएगा जो एक गोरे को आसानी से मिल जाती है। मीडिया भी उसे खास तवज्जोह नहीं देगा।

रंग को लेकर यह पूर्वाग्रह भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के दैनिक समाचार पत्रों में साफ दिखाई दे जाता है। एक नजर वर-वधू के विज्ञापनों पर दौड़ा लें। वहां हर कोई गोरी बहू ढूंढ़ रहा होता है। प्राय: रंग का जिक्र सबसे पहले या पहली पंक्ति में किया जाता है यानी रिश्ता पक्का करने का सबसे बड़ा आधार लड़की का रंग है। उसकी शिक्षा, योग्यता ज्यादा मायने नहीं रखती हैं।

रंग के आधार पर भेदभाव के कारण आत्महत्याओं के समाचार पढ़ने को मिल जाते हैं। हाल में नोएडा में एक किशोर ने 15वीं मंजिल से छलांग लगाकर आत्महत्या कर ली। मामले का संबंध उसके रंग से होने का संदेह जताया गया है। वह अक्सर इस बात को लेकर दुखी रहता था कि उसका रंग सांवला क्यों है।

विदेशी कंपनियों ने हमारी इस मानसिकता को जमकर भुनाया है। आज गोरा बनाने के क्रीम-पाउडर का अरबों का बाजार है। हम खुशी-खुशी उसका हिस्सा बने हुए हैं। ऐसे दर्जनों उत्पाद हैं जो यह दावा करते हैं कि वे आपको हफ्तेभर में गोरा बना देंगे। वे इसके फायदे भी गिनाते हैं, मसलन अगर लड़की गोरी होगी तो उसका रिश्ता आसानी से हो जाएगा, अगर लड़का गोरा होगा तो उसकी कोई महिला मित्र बन जाएगी, दोस्तों में रुतबा बढ़ जाएगा।

परंपरागत समाज में यह वाक्य भी हममें से बहुत ने सुना होगा कि ‘बीकै तो भू गोरी कोनी, काळी आई है’ (उसके तो बहू गोरी नहीं, काली आई है)। तो क्या गोरा नहीं होना अपराध है या इससे इन्सान का दर्जा घट जाता है?

पिछले दिनों ब्रिटेन के शाही परिवार का विवाद चर्चा में रहा था। सालभर पहले शाही परिवार से अलग हो चुके प्रिंस हैरी और उनकी पत्नी मेगन ने एक साक्षात्कार में जो दावे किए, उससे पता चलता है कि वहां रंगभेद की जड़ें कितनी गहरी हैं। मेगन की मानें तो शाही परिवार उनके बेटे आर्ची को प्रिंस का दर्जा नहीं देना चाहता था। उसे आर्ची के जन्म से पहले यह आशंका थी कि कहीं उसका रंग काला तो नहीं होगा! संभवत: इस शाही परिवार को भी यह महसूस होता है कि काले रंग के व्यक्ति को प्रिंस नहीं होना चाहिए, आखिर प्रतिष्ठा का सवाल जो ठहरा!

अगर हम अपने अवतारों, देवी-देवताओं और महापुरुषों की ओर देखें तो वहां किसी प्रकार का भेदभाव अस्तित्व नहीं रखता, रंगभेद भी नहीं। भगवान श्रीराम, श्रीकृष्ण तो हमारे प्राण हैं, उनके श्याम वर्ण को अतिसुंदर माना गया है। मां काली का स्वरूप शक्तिदायक, भयनिवारक है। काली गाय के दर्शन, सेवा को कल्याणकारी कहा गया है। काले श्वान को भोजन देना रोग, शोक, कष्टों को दूर करने वाला बताया गया है। ज्योतिष शास्त्र में उसका विशेष महत्व है। फिर हमारे समाज में रंग के प्रति ऐसा पूर्वाग्रह क्यों? हमें इस पर विचार करना होगा और इससे जितना जल्दी मुक्ति पा लें, वही हमारे हित में होगा। त्वचा के रंग से न कोई छोटा होता है और न बड़ा। सभी रंग प्रकृति के हैं और उनमें खुश रहना चाहिए।