दिशानिर्देशों का उल्लंघन कर क्यों फजीहत को आमंत्रण दें?

'दक्षिण भारत राष्ट्रमत' में प्रकाशित आलेख।
'दक्षिण भारत राष्ट्रमत' में प्रकाशित आलेख।

देखादेखी रुतबा दिखाना पड़ सकता है महंगा

श्रीकांत पाराशर
दक्षिण भारत राष्ट्रमत

हाल ही में मैंने अपने लेख “कहीं रंग में भंग न पड़ जाए” में नगर पुलिस आयुक्त के हवाले से लिखा था कि कोरोना संबंधी लाकडाउन के दिशानिर्देशों में अभी भी होटल और रिसोर्ट्स में विवाह आयोजन कर अधिक संख्या में लोगों को बुलाने की अनुमति नहीं है। इस संबंध में मैंने पुलिस आयुक्त का आदेश पत्र भी प्रकाशित किया था परंतु मेरी बात को दरकिनार कर कई परिवारों ने बड़े होटलों और रिसोर्ट्स में शादी के आयोजन किए, 200-300 लोगों को आमंत्रित किया। और ऐन वक्त पर खुद भी परेशानी में पड़े तथा अपने अतिथियों को भी आक्वार्ड सिचुएशन में डाल दिया। कुछ शादी के आयोजनों को तत्काल सीमित करना पड़ा और अपने आमंत्रित अतिथियों को वाट्सऐप पर यह मैसेज करना पड़ा कि स्थितियां प्रतिकूल होने से आयोजन स्थगित करना पड़ा है।

एक दो रिसोर्ट पर तो पुलिस पहुंच गई। स्वाभाविक है कि रंग में भंग पड़ गया। सारा उल्लास, खुशियां एकबारगी बाधित हो गईं। ऐसे में जैसा कि मैंने अपने लेख में लिखा था कि ऐसे आयोजनों में किसी की बातों में न आएं। किसी का रुतबा काम नहीं आएगा। जब मुसीबत आएगी तो होटल वाला भी हाथ झटक लेगा। लगभग वही स्थिति पैदा हुई। ऐसे आयोजनों में आयोजकों के सिर पर पहले पुलिस और प्रशासन की तलवार लटकती रही और बाद में पैसे भी लगे। ऐसे मामले पुलिस भी निचले स्तर पर रफा दफा नहीं कर सकती।

जब गर्दन मुसीबत में फंस जाती है तो फिर बचने की कीमत नहीं देखी जाती। कुल मिलाकर विवाह की परंपराओं को सीमित दायरे में करना पड़ा। विभिन्न आयोजनों पर जो तरह तरह के खर्चे किए गए थे, वे व्यर्थ चले गए। यह किसी एक शादी में नहीं हुआ, एक से अधिक शादियों में पुलिस और प्रशासन ने कार्रवाई की। इस स्थिति का जिन्होंने सामना किया, असली मुसीबत तो वही बयां कर सकते हैं परंतु सवाल यह उठता है कि हम अपने आप पर नियंत्रण नहीं कर पाते हैं और दूसरों की बातों में भी जल्दी आ जाते हैं।

सामान्यतः मारवाड़ी समुदाय सरकारी नियम कानूनों का पालन करने वाला समाज है। झंझट से दो गज की दूरी ही रखता है। किसी से झगड़ा झंझट करता नहीं। कभी कुछ परेशानी आ भी जाए तो कुछ ले दे के मामला सैटल करने में विश्वास रखता है। इसलिए कान्फीडेंस भी फुल रहता है। मामला शादी-ब्याह का हो तो फिर क्या कहने। शादी में खर्चे की बात आती है तो मन खर्चा करने के लिए कुलांचे भरने लगता है। आयोजन को बड़े से बड़ा करने में हम विश्वास करते हैं ताकि अपने अधिक से अधिक मित्रों, परिचितों, समाज के गणमान्यों को आमंत्रित कर सकें।

लगभग डेढ साल से कोरोना ने ऐसी परिस्थितियां पैदा कर दी हैं कि विवाह आयोजन भी सीमित लोगों के साथ घर पर ही करने पड़ रहे हैं। इस स्थिति में भी कुछ लोग रास्ता निकाल लेते हैं और निर्धारित संख्या से ज्यादा लोगों को बुलाकर ऐसा फील करते हैं जैसे उन्होंने बहुत बड़ा काम कर लिया है। उनकी देखादेखी दूसरे भी उसी राह पर बढ जाते हैं। ज्यादा धनाढ्य लोगों के इर्दगिर्द मित्र भी ऐसे होते हैं जो डींग हांकते हैं और कह देते हैं कि कुछ प्रोब्लम आएगी तो वे संभाल लेंगे। ऐसे निकट मित्र भव्यता में विश्वास करते हैं और फुल एंजॉय से कम उन्हें पसंद नहीं। अतिथियों को यही कहा जाता है कि केवल खास खास को ही बुला रहे हैं। अतिथि भी फूले नहीं समाता कि हम तो खासमखास में हैं इसलिए जाना ही पड़ेगा। बड़े फाइव स्टार होटल में या शहर से बाहर रिसोर्ट में कौन पूछने आता है इसलिए ज्यादा चिंता किए बिना लोगों की संख्या और सजावट के साधन बढते जाते हैं।

अनजाने में जिनकी नाव किनारे लग जाती है वे तो ठीक, जो फंस जाते हैं उनको लेने के देने पड़ जाते हैं। पुलिस को भी पार्टी की सामर्थ्य का पता चल जाता है तो वह भी पूरे दल बल के साथ आ धमकती है। मारवाड़ी समाज बुद्धिमान समाज माना जाता है परंतु अपने मन पर नियंत्रण करने में वह बहुत कमजोर है। वह कुछ खर्चा करे और 500-700 लोगों को भी पता न लगे, यह उसे गवारा नहीं। इसके लिए तो वह कुछ भी कर सकता है। इस बेजां हिम्मत का खामियाजा भी वही भुगतता है। कोरोना काल अभी समाप्त नहीं हुआ है। अभी भी ज्यादा लोगों का एकत्र होना खतरे से खाली नहीं है। शादी के आयोजन अपने घर पर, केवल नीयर एवं डीयर वन्स की उपस्थिति में ही किए जाएं तथा अगर खर्चा करने की कुलबुलाहट हो तो उसके नए रास्ते तलाशे जाएं, फिलहाल तो इसी में भलाई है।