सियासी अखाड़े में व्यवसायी पर निशाना क्यों?

कांग्रेस नेता राहुल गांधी। फोटो स्रोत: ट्विटर अकाउंट।
कांग्रेस नेता राहुल गांधी। फोटो स्रोत: ट्विटर अकाउंट।

भारत में आज़ादी के बाद से एक विचार या कहें एक खास विचारधारा ने जनमानस में गहरी जड़ें जमा ली हैं, जो व्यवसायी का हमेशा गलत चित्रण करती है। बॉलीवुड फिल्मों ने भी मौका देखकर इसे जमकर भुनाया और खूब नोट कमाए। सत्तर, अस्सी और उसके बाद के दशकों की फिल्मों पर गौर करेंगे तो पाएंगे कि व्यवसायी को हमेशा एक ऐसे शख्स के तौर पर दिखाया गया जो हद दर्जे का लालची, मिलावटखोर और देश को लूटने वाला होता है। व्यवसायी की यह छवि जनमानस में इतनी रच-बस गई कि आज भी बहुत लोगों को यही लगता है कि देश के विकास में व्यवसायी वर्ग का कोई योगदान नहीं होता, ये तो बस अपनी जेबें भरते हैं और मौका देखकर लंदन, पेरिस घूमने चले जाते हैं।

यह सोच कहीं न कहीं युवाओं के मन पर भी पकड़ बना चुकी है, इसलिए उनमें से बहुत कम व्यवसायी बनने का सपना देखते हैं। ज्यादातर का अरमान होता है कि कॉलेज की डिग्री हाथ में आते-आते उन्हें कोई सरकारी नौकरी मिल जाए, जहां ज़िंदगी आसानी से ​कटे। शादी हो जाए, दो प्यारे-प्यारे बच्चे हों और एक खूबसूरत बंगला हो। इस सोच ने देश का बड़ा नुकसान किया है, जिसके कारण हमारे युवाओं में स्वरोजगार की प्रवृत्ति पनप ही नहीं पाई। ऐसा नहीं है कि भारत के युवाओं में प्रतिभा की कमी है।

भारत के कॉलेजों से निकले छात्र/छात्रा आज अमेरिका, यूरोप की दिग्गज कंपनियां चला रहे हैं। गूगल, फेसबुक, माइक्रोसाफ्ट, ट्विटर — जहां देखो, भारतीय प्रतिभाएं नजर आती हैं। इसकी एक बड़ी वजह है कि अमेरिका, यूरोपीय देशों में सरकार और समाज ने व्यवसायी वर्ग को किसी अपराधी की तरह पेश नहीं किया। ऐसा माहौल बनाया गया कि दुनिया की हर कंपनी वहां जाना चाहती है। इसका फायदा उन्हें मिला। आज वे अर्थव्यवस्था, शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार, पासपोर्ट की शक्ति.. इन सब मामलों में आगे हैं। उनके पास अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए बजट की कमी नहीं है।

वहीं, भारत में एक खास विचारधारा का व्यवसाय से छत्तीस का आंकड़ा रहा है। उसके लोग हमेशा बगावत का झंडा लेकर खड़े रहते हैं यानी न खुद कुछ करेंगे और न किसी को करने देंगे! भारतीय फिल्मों ने किसान, सैनिक, शिक्षक, डॉक्टर की छवि को बहुत अच्छी तरह से पेश किया। ये इसके हकदार हैं, पर व्यवसायी के साथ इंसाफ नहीं किया। अगर किसान न हो तो सबकी थालियां खाली पड़ी रहें, लोग भूखे मरें। अगर सैनिक न हो तो देश पर शत्रुओं का कब्जा हो जाए। अगर शिक्षक न हो तो दुनिया अज्ञान के अंधकार में डूब जाए। अगर डॉक्टर न हो तो बीमारी की हालत में कोई बचाने वाला न हो। हर पेशे का महत्व है, जिसका सम्मान किया जाना चाहिए।

जिस प्रकार एक सशक्त राष्ट्र के लिए इन पेशेवरों की जरूरत है, उसी प्रकार व्यवसायी की भी जरूरत होती है। एक मेहनती, ईमानदार, दूरदर्शी व्यवसायी के प्रयासों से देश का भविष्य आकार लेता है। उसके कौशल से कई लोगों को रोजगार मिलता है, उनके घरों का चूल्हा जलता है। जब व्यवसायी कर देता है तो देश का खजाना भरता है। उससे बुजुर्गों को पेंशन, किसान को सस्ती खाद, गरीबों को सस्ता ईंधन और सस्ता इलाज मिलता है।

अच्छे और बुरे लोग हर पेशे में होते हैं। व्यवसायी वर्ग इससे अलग नहीं है। वह इसी समाज का हिस्सा है, जो जवान, किसान, शिक्षक, डॉक्टर पैदा करता है। अगर कोई व्यवसायी नियमों का उल्लंघन करे, कर्मचारियों को सताए, ग्राहकों का हक मारे, देश को नुकसान पहुंचाए तो इसके लिए कानून मौजूद है, उसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन यह धारणा बना लेना कि हर व्यवसायी बुरा होता है और उसका देश की भलाई में कोई योगदान नहीं, तो यह बेबुनियाद है।

इन दिनों कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और वायनाड के यशस्वी सांसद राहुल गांधी जोरशोर से ‘हम दो, हमारे दो’ का नारा लगा रहे हैं। उनका कहना है कि मोदी और अमित शाह को सिर्फ ‘दो व्यवसायियों’ की चिंता है। उनका इशारा अंबानी और अडानी की तरफ है। इससे पहले भी राहुल ‘सूट-बूट की सरकार’ का जिक्र कर हमला करते रहे हैं। राहुल विपक्ष के बड़े नेता हैं। अगर उन्हें लगता है कि केंद्र सरकार पूरा देश दो व्यसायियों के हवाले कर रही है तो वे अपने वकीलों को मैदान में उतारें और सरकार को न्यायालय में घसीट ले जाएं, जनता के सामने सबूत सहित पर्दाफाश करें। अगर वे इतना भर कर दें तो पूरा देश उनकी तारीफ करते नहीं थकेगा।

अगर उनके दावे कोरे हवा-हवाई हैं, तो उन्हें चाहिए कि अपने व्यक्तित्व में कुछ परिपक्वता का समावेश करें। राहुल गांधी कांग्रेस के पुराने दस्तावेज खंगालें। जब देश आज़ादी की लड़ाई लड़ रहा था तो महात्मा गांधी के आह्वान पर किस तरह व्यवसायियों ने ज़िंदगीभर की जमा-पूंजी देश के लिए समर्पित कर दी थी। कोरोना काल में हमने देखा कि कारोबार में मंदी के बावजूद व्यवसायी यथासामर्थ्य दान करते रहे और इस देश की ताकत बनकर खड़े रहे। अगर देश को मजबूत बनाना है तो किसान, जवान और अन्य पेशेवरों के साथ व्यवसायी को भी मजबूत करें। जिन देशों में व्यवसायी लुटे, पिटे हैं, वहां की आम जनता कितनी खुशहाल है, यह गूगल पर देख लें। वैसे, गूगल भी एक व्यवसायी की ईजाद है!