अपने काम में व्यस्त ड्रोलमा
अपने काम में व्यस्त ड्रोलमा

.. राजीव शर्मा ..

ल्हासा/दक्षिण भारत। ‘मैं यह काम कैसे कर सकता हूं?’, ‘मुझे तो पढ़ाई छोड़े वर्षों हो गए!’, ‘मेरी शक्ल अच्छी नहीं’, ‘मेरे जैसे लोग थोड़े ही कामयाब होते हैं’, ‘मेरी तो किस्मत ही फूटी है’ – आमतौर पर खुद को कमतर दर्शाने वाली ऐसी कई बातें हम लोगों से सुनते रहते हैं जो स्वयं पर भरोसे की कमी जाहिर करती हैं।

आज हम आपको उस तिब्बती महिला की कामयाबी की कहानी बताएंगे जो गरीब परिवार में पैदा हुईं, पढ़ाई-लिखाई भी ज्यादा नहीं कर सकीं, संसाधनों का अभाव था लेकिन आज उनकी कंपनी का माल देश-दुनिया के कई शहरों में बिक रहा है और खूब पसंद किया जा रहा है।

इनका नाम ड्रोलमा है और ये एक वस्त्र कंपनी चलाती हैं। एक साक्षात्कार में ड्रोलमा ने बताया, ‘मैं पांच लड़कियों के परिवार में सबसे बड़ी हूं। बचपन से ही मुझे तिब्बती कपड़े बहुत पसंद हैं। इस वजह से मेरे परिवार ने मुझे कपड़ा सिलाई के लिए प्रेरित किया।’

वे कहती हैं, ‘जब मैं सिर्फ 15 साल की थी, तब बहुत रुचि के साथ यह सीखने लगी कि कपड़ों की सिलाई कैसे की जाती है।’ उस समय शुरू हुआ यह सफर अब 57 साल की उम्र में भी जारी है। ड्रोलमा अपने सधे हुए हाथों से तिब्बती कपड़े तैयार करती हैं और उनके कई प्रॉडक्ट तो आसपास के इलाकों में सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं।

वे जब भी सिलाई मशीन के सामने बैठकर कपड़े तैयार करती हैं, तो उन्हें वही संतुष्टि और उपलब्धि की भावना हासिल होती है जैसा कि वे बचपन में कपड़ों की सिलाई सीख रही थीं तब होती थी। उनके द्वारा बनाए गए कपड़े चमकीले रंगों और उत्कृष्ट डिजाइनों से युक्त होते हैं। वे इनमें पारंपरिक तिब्बती शैली को ध्यान में रखते हुए आधुनिकता का समावेश करती हैं।

ड्रोलमा बताती हैं, ‘तिब्बती लोगों की जीवन शैली में तिब्बती कपड़े बहुत महत्वपूर्ण हैं, हर किसी के पास कम से कम एक सेट होता है, जिसकी ज़रूरत शादी, विभिन्न संस्कार, छुट्टियों और नृत्य समारोहों आदि के दौरान होती है।’

तिब्बती पोशाक
तिब्बती पोशाक

ड्रोलमा के लिए शुरुआत बिल्कुल भी आसान नहीं रही। आर्थिक अभाव, संसाधनों की कमी जैसी समस्याएं उनका पीछा करती रहीं लेकिन उन्होंने अपनी रुचि को दम तोड़ने नहीं दिया। वे पूरी लगन के साथ कपड़ों की सिलाई, नए डिजाइन और तकनीक सीखती रहीं।

कुछ खास मौकों पर तो उनके पास इतने ऑर्डर आ जाते हैं कि उन्हें पूरे करने में और ज्यादा तेजी से काम करना पड़ता है। तिब्बत में वसंत महोत्सव को लेकर काफी उत्साह होता है। इस अवसर पर ड्रोलमा के पास भारी संख्या में ऑर्डर आते हैं।

ड्रोलमा की कंपनी दैनिक जीवन और विशेष अवसरों दोनों के लिए कपड़े बनाती है। इनकी कीमत कुछ हजार से लेकर एक लाख रुपए तक होती है। कपड़ों के अद्भुत शिल्प कौशल के कारण उनमें से कई तो संग्रहालयों में भी जगह पा चुके हैं।

ड्रोलमा की कहानी यह बताती है कि अगर जीवन में आगे बढ़ने की उमंग और मेहनत करने की भरपूर इच्छाशक्ति हो तो बाधाएं अधिक समय तक रास्ता नहीं रोक पातीं। अगर आपका हुनर ही साथी बन जाए तो इस राह पर आपके कदम कई लोगों के लिए प्रेरणा बन जाते हैं।