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भारत में रोहिंग्या घुसपैठ, कहीं मुसीबत न बन जाए अति-उदारता
 
भारत में रोहिंग्या घुसपैठ, कहीं मुसीबत न बन जाए अति-उदारता
दक्षिण भारत राष्ट्रमत में प्रकाशित संपादकीय

उत्तर प्रदेश एटीएस टीम द्वारा मानव तस्करी मामले में दो रोहिंग्याओं की गिरफ्तारी गंभीर सवाल खड़े करती है, जिस पर विचार करने की आवश्यकता है। आरोपी शाहिद और फारुख उर्फ हसन की गतिविधियां प्रकाश में आने के बाद यह पता लगाने की जरूरत है कि देशभर में ऐसे कितने लोग हैं जो ऐसा कर रहे हैं? ये दोनों म्यांमार के रोहिंग्याओं को अवैध रूप से भारत लाकर उन्हें विभिन्न इलाकों में बसा रहे थे। इस कार्रवाई के लिए उत्तर प्रदेश पुलिस की जितनी सराहना की जाए, कम है। दुनिया में कोई देश अवैध आव्रजन को बर्दाश्त नहीं कर सकता। क्या भारत कोई धर्मशाला है कि जिसकी मर्जी हो आए और जहां मन करे, बस जाए?

वैसे अब धर्मशाला का उदाहरण पुराना हो चला है। धर्मशालाओं के भी कुछ नियम होते हैं, वहां बिना इजाजत कोई नहीं रहने देता। रोहिंग्याओं के बारे में इससे पहले जो रिपोर्टें आई हैं, वे देश की एकता, अखंडता एवं सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती रही हैं। भारत को इतना उदार नहीं होना चाहिए कि भविष्य में उसके नागरिकों की सुरक्षा ही खतरे में पड़ जाए। हम अतीत में इस अति-उदारता के परिणाम भुगत चुके हैं।

साल 2017 में म्यांमार से बड़ी संख्या में रोहिंग्या बांगलादेश पहुंच गए थे। उनमें से कई अवैध ढंग से घुसपैठ कर भारत आ चुके हैं। जिस बांग्लादेश ने उनके लिए दरवाजे खोले, वहां इससे कई समस्याएं खड़ी हो गई हैं। इनका स्थानीय नागरिकों से टकराव होता रहता है। यही नहीं, बांग्लादेश के सुरक्षा बलों के साथ गोलीबारी तक हो चुकी है।

सितंबर 2019 में बांग्लादेश के दूरसंचार नियामक निकाय ने ऑपरेटरों को आदेश दिया था कि वे देश के दक्षिण-पूर्व में बेतरतीबी से फैले हुए रोहिंग्या शिविरों में मोबाइल सेवाएं बंद कर दें। इसके पीछे जो वजह बताई गई, वह राष्ट्रीय सुरक्षा थी। बांग्लादेश के स्थानीय मीडिया में ऐसी रिपोर्टें आई थीं जिनमें कहा गया था कि उक्त शिविरों में ऐसे लोग मौजूद हैं जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा हो सकते हैं।

इसी तरह नवंबर 2018 में रोहिंग्या घुसपैठियों के संबंध में एक रिपोर्ट में बताया गया था कि वे सुदूर दक्षिण से लेकर लद्दाख तक पहुंच गए हैं। यह खुफिया रिपोर्ट गृह मंत्रालय को भेजी गई थी। इसके बाद सोशल मीडिया पर यह आवाज उठी थी कि रोहिंग्याओं की अवैध घुसपैठ को रोका जाए। इन्हें इनके देश म्यांमार भेजा जाए अन्यथा शांति और आध्यात्मिकता में लीन लद्दाख भविष्य में अलगाववाद और आतंकवाद की आग में झुलसने लगेगा।

देश में ऐसे ‘बुद्धिजीवियों’ की कमी नहीं है जो यह मांग करते हुए उच्चतम न्यायालय का द्वार खटखटा चुके हैं कि रोहिंग्याओं को वापस म्यांमार न भेजा जाए। इससे अच्छा है कि इन्हें भारत में ही बसा दिया जाए! इन्हें नागरिकता के साथ आवास और बेहतर सुविधाएं दी जाएं! याचिका में यह मांग की गई थी कि मोदी सरकार को रोहिंग्याओं के अधिकारों की रक्षा के लिए अपनी जिम्मेदारी का अहसास होना चाहिए। हालांकि उच्चतम न्यायालय ने वह याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि हमें अपनी जिम्मेदारी मालूम है और किसी को याद दिलाने की जरूरत नहीं है।

अवैध घुसपैठिए हर देश के लिए खतरा होते हैं। ये जहां जाते हैं, उसकी अर्थव्यवस्था पर बोझ बनते हैं। स्थानीय समुदाय से तालमेल न कायम करने से भविष्य में अपराध में बढ़ोतरी की आशंका होती है। विदेशी घुसपैठ का ज्वलंत उदाहरण जम्मू-कश्मीर के रूप में सामने है, जहां आए दिन हमारे सैनिक वीरगति को प्राप्त हो रहे हैं। क्या हम घुसपैठियों के प्रति नरमी बरतकर ऐसे और मोर्चे खोलने की स्थिति में हैं? और क्योंं हों? भारत को यह पूरा अधिकार है कि वह तय करे कि अपनी भूमि पर विदेश से आने की अनुमति किसे देनी है और किसे नहीं देनी है। हाल में यूरोप में ऐसी कई घटनाएं सुर्खियों में रहीं जब विभिन्न देशों से गए शरणार्थियों ने स्थानीय नागरिकों की बेरहमी से हत्याएं कीं। ज्यादातर में लोगों पर छुरियां चलाई गईं।

आज यूरोप अति-उदारवाद का दंड भोग रहा है। उसने नियम बनाते हुए सिर्फ अपने मूल निवासियों का ध्यान रखा लेकिन इस बात पर गौर करना भूल गया कि जो बाहर से आएंगे, क्या वे उसके खुले माहौल को आत्मसात कर पाएंगे? अगर भारत में रोहिंग्या घुसपैठ इसी तरह होती रही तो भविष्य में कई संगठन उन्हें भोजन, रोजगार, आवास, चिकित्सा, शिक्षा, बिजली, पानी और नागरिकता देने की मांग करने लगेंगे। इन सबका भार देश के आम नागरिक क्यों भुगतें?

इस मामले में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का रवैया सबसे ज्यादा निराश करने वाला रहा है। उन्होंने साल 2005 में लोकसभा में बयान दिया था कि बंगाल में घुसपैठ आपदा बन चुकी है। उन्होंने सदन में भारी हंगामा मचाया था। आज वे ही ममता दीदी घुसपैठ के मुद्दे पर चुप हैं और एनआरसी का विरोध करने में सबसे आगे हैं। सियासी फायदे के लिए यह खामोशी देश के भविष्य के लिए शुभ नहीं है।