दक्षिण भारत राष्ट्रमत के समूह संपादक श्रीकांत पाराशर
दक्षिण भारत राष्ट्रमत के समूह संपादक श्रीकांत पाराशर

श्रीकांत पाराशर
समूह संपादक, दक्षिण भारत

सामान्यतया लोग कहा करते हैं कि जिनको भगवान में भरोसा है, वे आस्तिक और जो भगवान को नहीं मानते वे नास्तिक कहलाते हैं। मुझे नहीं पता कि इस परिभाषा को कैसे लिया जाए और कैसे आस्तिक और नास्तिक का वर्गीकरण किया जाए परंतु मेरा यह मानना है कि इस ब्रह्मांड में कोई तो ऐसी शक्ति है जो अदृश्य रूप से इसको संचालित करती है। यदि ऐसा नहीं होता तो पहाड़ों से निकल कर कलकल करती नदियां जंगलों से, गांवों से, कस्बों से होती हुईं कैसे समुद्र में जा मिलतीं, कैसे पक्षी सुबह सुबह अपने पंखों के बल पर आसमान को नापने के लिए निकल पड़ते और शाम होने से पहले अपने घोंसले में लौट आते, कैसे झरने रात-दिन अनवरत बहते रहते, कैसे रात को ही जुगनू टिमटिमाते, कैसे भोर में पक्षियों का कलरव सुनाई देता, कैसे बरसात आने की आहट मात्र से मोर अपने पंख फैलाकर नाचने लगता, कैसे गेहूं की बालियों में दाने पड़ते और वह मनुष्य का भोजन बनता? ऐसे न जाने कितने जिज्ञासु सवाल किसी के भी मन में उठते ही होंगे और सहज ही मन एक बारगी तो इसका यही जवाब देता होगा कि कुछ न कुछ अदृश्य शक्ति है जो यह सब संचालित करती है। उस शक्ति को कोई क्या नाम देता है यह उस व्यक्ति पर निर्भर करता है परंतु इस शक्ति को सिरे से खारिज तो नहीं किया जा सकता है। जो इस शक्ति को स्वीकार करता है वह मेरी नजर में आस्तिक है। मैं उसी शक्ति को ईश्वर, परमात्मा कहना चाहूंगा और उसकी एक छवि भी मेरी अपनी पसंद के अनुसार मेरे मनोमस्तिष्क पर बन चुकी है, जो अमिट है। मुझे मेरे ईश्वर पर पूरा भरोसा है और मैं यह भी मानता हूं कि भरोसा कभी आधा अधूरा नहीं होता। भरोसा या तो होता है या फिर नहीं होता। भरोसा कभी टुकड़ों में नहीं होता, कि थोड़ा भरोसा है, थोड़ा नहीं। अपने ईश्वर के प्रति यह दृढ विश्वास, यह भरोसा ही आस्था है।

कुछ लोग अपनी आस्था अपने मन में रखते हैं और उसका पूजा पाठ या अन्य धार्मिक अनुष्ठान करके प्रदर्शन नहीं करना चाहते। कुछ को तो ऐसा करने में संकोच महसूस होता है क्योंकि उनके मन में कहीं यह धारणा बनी बैठी होती है कि पूजा-पाठ और अनुष्ठान करने से कोई उन्हें पुरातनपंथी न समझ बैठे। कहीं उन पर दकियानूसी और रूढिवादी होने का ठप्पा न लग जाए। कहीं उनके पढे लिखे होने पर, कहीं उनकी विद्वता पर आंच न आ जाए। कहीं कोई उनको आम आदमी की श्रेणी में न डाल दे। इस भय से वह चाहकर भी अपने ईष्ट के प्रति अपनी आस्था को प्रकट करने से बचते हैं, बल्कि छुपाने का झूठा यत्न भी करते हैं। ऐसे लोगों से तर्क किया जा सकता है परंतु इसमें समझदारी नहीं है क्योंकि वे इसके लिए भी कुतर्क ढूंढ लेते हैं। जो मन के किसी कोने में आस्थावान हैं परंतु ऐसा दिखना नहीं चाहते, उन्हें उनके हाल पर छोड़ देना चाहिए। इससे आपको यह लाभ होगा कि आप आस्था के पक्ष में जो तर्क और तथ्य रखेंगे उन्हें कुतर्कों से काटने की कुचेष्टा करने के लिए किसी को प्रेरित करने से बच जाएंगे।

मैं यह मानता हूं कि आस्था एक ऊर्जा का स्रोत है। एक ऐसा प्रकाशपुंज है कि जब कोई आस्थावान व्यक्ति जीवन के किसी ऐसे मोड़ पर आ खड़ा होता है, जहां उसे आगे अंधेरा ही अंधेरा दिखता है, कोई रास्ता नहीं दिख रहा तो उसे उसका ईश्वर, उसका परमात्मा सही रास्ता दिखा देता है। जब भी कोई व्यक्ति किसी मुसीबत में फंसता है तो वह ईश्वरीय शक्ति उसको हिम्मत बंधाती है, उस मुसीबत से बाहर निकलने की शक्ति प्रदान करती है। यह शक्ति आप में तभी निर्मित होगी जब आपकी किसी के प्रति आस्था है। आपको जब यह भरोसा होगा कि संकट के समय आपका परमात्मा आपके साथ होगा, तो निश्चय ही वह किसी न किसी रूप में आपके साथ खड़ा दिखाई देगा। ऐसा अनगिनत लोग महसूस करते हैं और आप भी कर सकते हैं, यदि आप आस्थावान हैं। इसलिए यह कहना ठीक होगा कि आस्था मनुष्य को एक ऊर्जा देती है, एक शक्ति प्रदान करती है।

भगवान के प्रति आस्था इतनी होनी चाहिए कि हम यह मानकर चलें, हमें अपना काम ईमानदारी से करना है, हमारे प्रयासों में कोई कमी न रहे फिर भगवान जो भी करेगा, वह हमारे अच्छे के लिए करेगा। यदि धूप छांव भरे जीवन में कभी कोई कष्ट भी आए तो हमें यह भरोसा होना चाहिए कि उस कष्ट के बाद कुछ अच्छा होने वाला है। मुश्किलों से घबराने के बजाय यह मानकर चलना चाहिए की जीवन की कोई महत्वपूर्ण सीख देने के लिए ही मुश्किल सामने आई है। कष्टों से हमेशा कुछ न कुछ सीखने को मिलता है। जीवन में परिपक्वता आती है। यदि मुश्किलों में भी हमारे मन में यह भाव रहे कि मेरा ईश्वर मेरे साथ खड़ा है तो मुश्किल भी आसान महसूस होगी। बहुत सी परेशानियां तो केवल मन का भ्रम होती हैं, हमारे मन द्वारा खड़ी की हुई होती हैं। वास्तव में वे कोई परेशानियां ही नहीं होतीं। जैसे ही हम उनके बारे में सकारात्मक सोचने लगते हैं, वे गायब हो जाती हैं। हम जब किसी मुसीबत में फंसे हों और यह सोचने लग जाएं कि अब इससे बाहर निकलना असंभव है, तो वास्तव में वह असंभव ही हो जाएगा। हम प्रयास करना छोड़ देंगे और हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाएंगे। ऐसे निखट्टुओं की मुसीबतें कभी हल नहीं होतीं। और यदि अपने ईश्वर पर भरोसा है कि वह मुसीबत से आपको उबार देगा तो आप पीछे नहीं हटेंगे बल्कि प्रयासों में जुट जायेंगे।

दरअसल जब हम परेशानियों से घिरते हैं तब हमें अपना भगवान याद आता है और हम उन परेशानियों के लिए उन्हें या तो कोसने लगते हैं या फिर उनसे बाहर निकालने के लिए गिड़गिड़ाने लगते हैं। भगवान ने यदि हमें उस कठिन वक्त में हौसला दिया और हम मुसीबत से बाहर आ गए तो हम उनको धन्यवाद देना भी जरूरी नहीं समझते। यदि हमारे मनमुताबिक काम न हुआ तो हम परमात्मा को ही अपनी असफलता का दोषी बताने लगते हैं। यह सच्चाई है कि ईश्वर ने जो कुछ हमें दिया है, हम उसके लिए भी ईश्वर का शुक्रिया अदा नहीं करते। हमने जो कुछ पाया है, क्या वह हम अपने साथ लेकर आये थे? नहीं, उस अदृश्य शक्ति ने हमें इस योग्य बनाया कि हम जिंदगी के इस मुकाम तक पहुंचे। हमने जो उपलब्धियां हासिल कीं उनमें भी उसी शक्ति का योगदान है किंतु हम सुख में अपनी आस्था के केंद्र को, शक्तिपुंज को भुला देते हैं और जब भी परेशानी में फंसते हैं तब सबे पहले वही याद आता है। ऐसा नहीं है कि सभी लोग ऐसा करते हैं, परंतु यह सामान्य मानव स्वभाव है। ऐसे भी बहुत से लोग हैं जो रोज अपनी उपलब्धियों के लिए अपने परमात्मा का शुक्रिया अदा करते हैं और कठिनाई के समय उसे याद तो करते हैं परंतु कोसने के लिए नहीं, हिम्मत देने के लिए। परमात्मा को जब हम मुसीबत में याद करते हैं तो कठिनाई से संघर्ष के लिए हमारी ताकत दोगुनी हो जाती है।

बहुत से लोग भगवान में आस्था भी शर्तों के साथ करते हैं। उनकी कोई मनोकामना पूरी होगी तो वे भगवान में भरोसा करेंगे अन्यथा नहीं। इसीलिए लोग अपने आस्था के केंद्र भी बदलते हुए दिखाई देते हैं। उन्हें यह सोचना चाहिए कि भगवान ने भी तो यही सोचकर रखा होगा कि जिसको उनके प्रति आस्था होगी, वे उसी की मनोकामना पूरी करेंगे। तात्पर्य यह है कि ईश्वर के प्रति आस्था एक लेनदेन का सौदा नहीं होना चाहिए। आपने कितने उपवास किए, कितनी माला फेरी, कितनी बार मंदिर गए उस संख्या का कोई महत्व नहीं है, अगर आपको अपने ईश्वर पर भरोसा ही नहीं है। प्रभु पर भरोसा रखने से जो शक्ति मिलती है वह किसी भी संकट से पार कराने में सक्षम है, फिर शर्तों का महत्व क्या?

एक बात और, यदि हमारी किसी भी दैवीय शक्ति के प्रति आस्था है तो यह मानकर चलना चाहिए कि वह शक्ति हमें किसी के बारे में बुरा सोचने ही नहीं देगी, हमारे मन में किसी को कोई कष्ट पहुंचाने का विचार नहीं आयेगा। बल्कि जिनकी आस्था किसी के प्रति नहीं है वैसे व्यक्ति संवेदनशील नहीं हो सकते। यदि आप आस्थावान हैं तो परमात्मा हमेशा आपसे अच्छे कार्य करवायेगा। आस्थावान व्यक्ति में मानवता, दया, करुणा के भाव स्वतः जागृत हो जाते हैं। ईश्वर उसके हाथों से दूसरों की मदद करवाता है, उसे ऐसी सामर्थ्य और सोच देता है कि जरूरतमंदों की मदद करे। यह सब करने के लिए मनुष्य को ईश्वर ही प्रेरित करता है। इससे मनुष्य को सुकून मिलता है, एक शांति मिलती है। इससे मनुष्य एक इंसान बनता है, अच्छा इंसान। इस पूरे चिंतन का सार यही है कि आस्था एक शक्ति का पुंज है, एक ऊर्जा का स्रोत है, एक शांति का उद्गम स्थल है।