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मानसिक संबल
जब देश में कोरोना संक्रमण के मामलों में तेजी आई तो उसका असर हर क्षेत्र पर हुआ, लेकिन स्कूल-कॉलेजों पर तो ताला ही लग गया था
 
आज के स्कूली विद्यार्थी कल के डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, शिक्षक, सैनिक, नेता आदि हैं

देश कोरोना महामारी से उबर रहा है। उद्योग-धंधों से लेकर पर्यटन तक हर जगह स्थिति सामान्य होती नज़र आ रही है, लेकिन अब भी संक्रमण के मामले सामने आ रहे हैं, इसलिए सावधानी जरूरी है। इस स्थिति को लेकर स्कूली विद्यार्थियों के अभिभावक चिंतित हैं। महामारी ने कई विद्यार्थियों की पढ़ाई पहल ही चौपट कर दी है। ऑनलाइन कक्षाओं की संख्या में बढ़ोतरी जरूर हुई, लेकिन वे पंरपरागत कक्षाओं का विकल्प नहीं हो सकतीं।

अब स्कूली बच्चों की पढ़ाई बाधित न हो, इसके लिए जरूरी है कि स्कूलों में स्वच्छता, सुरक्षित दूरी और मास्क संबंधी सावधानी बरती जाए। देश ने कोरोना महामारी के खिलाफ बड़ा संघर्ष किया है। इसका सबसे बड़ा नुकसान तो लाखों लोगों के प्राणों का हुआ, लेकिन स्कूली विद्यार्थियों को भी भारी कीमत चुकानी पड़ी है। खासतौर से शुरुआती कक्षाओं के बच्चों ने। अगर नींव ही कमज़ोर रह गई तो भवन मजबूत नहीं बन सकता। इसलिए अब सावधानी बरतते हुए ऐसे इंतजाम किए जाएं कि किसी भी स्थिति में पढ़ाई बाधित न हो।

जब देश में कोरोना संक्रमण के मामलों में तेजी आई तो उसका असर हर क्षेत्र पर हुआ, लेकिन स्कूल-कॉलेजों पर तो ताला ही लग गया था। आज के स्कूली विद्यार्थी कल के डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, शिक्षक, सैनिक, नेता आदि हैं। इनके भविष्य को ध्यान में रखते हुए ऐसे प्रयास अवश्य किए जाएं कि कोरोना काल में पढ़ाई का जितना नुकसान हुआ, उसकी भरपाई हो जाए। अगर पूरी भरपाई संभव न हो तो उन्हें इसका पर्याप्त ज्ञान अवश्य कराया जाए।

ऑनलाइन कक्षाओं के जरिए शहर और कस्बों के विद्यार्थी तो किसी हद तक जुड़े रहे, लेकिन गांव-ढाणियों में ऐसे बच्चों की बड़ी संख्या है, जो इससे वंचित ही रहे। खासतौर से सरकारी स्कूलों के बच्चों को ऐसी सुविधा नहीं मिल पाई। विद्यार्थियों के लिए यह समय दोहरी चोट साबित हुआ। उनकी पढ़ाई को तो नुकसान हो ही रहा था, उधर परिवारों की आर्थिक स्थिति खराब हो गई। कई बच्चों ने अपने माता-पिता में से एक या दोनों को खो दिया।

यह घोर मानसिक तनाव का दौर था। ऐसे में शिक्षा मंत्रालय द्वारा सभी राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों में एनसीईआरटी व मनोदर्पण सेल के जरिए करीब पौने चार लाख स्कूली बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य का सर्वेक्षण करना उचित ही है। एनसीआरबी का यह आंकड़ा बहुत दुखद और चिंताजनक है कि पिछले साल करीब 13,000 विद्यार्थियों ने आत्महत्या कर ली। स्कूली विद्यार्थियों में मानसिक तनाव स्वाभाविक है। वे पढ़ाई के साथ कई चुनौतियों से जूझ रहे होते हैं, जिनमें व्यक्तिगत, पारिवारिक, आर्थिक या सामाजिक होती हैं। हमारे स्कूलों में ऐसा कोई ठोस तंत्र ही नहीं है, जो विद्यार्थियों की पीड़ा समझे और उन्हें उचित परामर्श दे। अगर इन बच्चों को सही समय पर उचित मनोवैज्ञानिक परामर्श मिला होता तो ये जीवित होते और भविष्य में देश की प्रगति में योगदान देते।

स्कूल प्रबंधकों को चाहिए कि वे बच्चों के व्यवहार का अध्ययन एवं उन्हें परामर्श उपलब्ध कराने के लिए तंत्र विकसित करें। स्कूली विद्यार्थियों का मन बहुत कोमल होता है। वे जब किसी समस्या की वजह से मन ही मन घुटन महसूस करते हैं तो जरूरी है कि कोई उसे आत्मीयतापूर्वक सुने और उचित परामर्श दे। यह भी देखने में आता है कि कई शिक्षक अपने विद्यार्थियों के साथ बहुत ही रूखा और कठोर व्यवहार करते हैं। क्या कोई बच्चा उन्हें अपनी समस्या बताने की हिम्मत कर सकेगा? उन्हें डर रहता है कि अगर उन्होंने समस्या बताई तो डांट-फटकार कर भगा दिए जाएंगे। इससे बच्चा अंदर ही अंदर एक ऐसे तूफान में फंस जाता है, जिससे बाहर निकलने का रास्ता उसे नजर नहीं आता।

इससे कालांतर में कई मनोवैज्ञानिक समस्याएं जन्म ले लेती हैं या वह कोई गलत कदम उठा लेता है। ऐसी स्थिति पैदा न हो, इसके लिए जरूरी है कि हर स्कूल सिर्फ किताबें पढ़ाने का केंद्र न बने, वह विद्यार्थी को मानसिक संबल देने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाए।

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