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सुखद पहल
फिल्म निर्माताओं की जिम्मेदारी है कि वे अच्छी फिल्में बनाएं, जो समाज को बेहतर बनाएं
 
कश्मीर की क्षेत्रीय भाषाओं में उन नायकों के जीवन पर फिल्में बननी चाहिएं, जिन्होंने भारत की स्वतंत्रता एवं अखंडता में योगदान दिया है

कश्मीर में तीन दशक के इंतजार के बाद सिनेमा घर का खुलना सुखद है। इससे आमजन हर्षित हैं, जो मंगलवार को फिल्म देखने से पहले राष्ट्रगान के सम्मान में खड़े होकर इन लम्हों के गवाह बने। निस्संदेह बेहतर समाज के लिए मनोरंजन के साधनों का होना जरूरी है। श्रीनगर के बाद अब घाटी के उन सिनेमाघरों के ताले भी खुलने चाहिएं, जो नब्बे के दशक में आतंकवाद की विभीषिका में बंद हो गए थे।

फिल्म निर्माताओं की जिम्मेदारी है कि वे अच्छी फिल्में बनाएं, जो समाज को बेहतर बनाएं। साथ ही कश्मीर की क्षेत्रीय भाषाओं में उन नायकों के जीवन पर फिल्में बननी चाहिएं, जिन्होंने भारत की स्वतंत्रता एवं अखंडता में योगदान दिया है। एक दौर था, जब भारतीय फिल्मों में कश्मीर की वादियों के नज़ारे जरूर होते थे। अगर सर्द मौसम, बर्फ से ढंके पहाड़, बल खाते रास्ते, अंगीठी तापते लोग आदि दिखाने हों और कश्मीर न दिखाया तो फिल्म अधूरी मानी जाती थी। शम्मी कपूर और शर्मिला टैगोर की फिल्म ‘कश्मीर की कली’ को कौन भूल सकता है!

लेकिन जब से कश्मीर पर पाकिस्तान की मैली नज़र पड़ी है, उसने सबकुछ तहस-नहस करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। जिस कश्मीर के बारे में कहा जाता था कि अगर धरती पर कहीं स्वर्ग है, तो यहीं है, यहीं है, यहीं है; उसके साथ पाकिस्तान के इशारे पर गोलियों की गूंज, नफरती नारे, आगजनी का धुआं और बारूद की गंध इस कदर जुड़ गईं कि फिल्म निर्माताओं ने यूरोप का रुख कर लिया। इससे कश्मीरियों को भारी नुकसान हुआ।

कश्मीर का सिनेमा उद्योग तो चौपट हो ही गया था, कश्मीरी पंडितों का जिस तरह नरसंहार किया गया, उसने हर मानवता-प्रेमी को क्षुब्ध कर दिया था। जो लोग इस संपूर्ण घटनाक्रम के पीछे थे, वे इस्लामाबाद और रावलपिंडी के आलीशान बंगलों में मौज कर रहे थे। इन सबसे एक आम कश्मीरी को क्या मिला? इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।

निस्संदेह कश्मीर हमारा है तो कश्मीरी भी हमारे हैं। एक ओर जहां देशभर में सिनेमाघरों की विशाल शृंखला है, वहीं कश्मीर में तीन दशक से ज्यादा समय तक सिनेमाघरों के दरवाजे बंद रहना स्थानीय लोगों के साथ अन्याय ही है। इस अवधि में एक पीढ़ी जवान हो गई, जिसने अपने बुजुर्गों से किस्सों में ही सुना कि कभी यहां सिनेमाघर हुआ करते थे।

नब्बे के दशक में जन्मे कश्मीरी को सिनेमा के मनोरंजन से वंचित करने वाले वे पाकिस्तानी हुक्मरान और कट्टरपंथी हैं, जिनके अपने बच्चे लंदन, दुबई और वॉशिंगटन डीसी में सेटल हैं, लेकिन उनकी ख्वाहिश है कि आम कश्मीरी पढ़ाई, रोज़गार, मनोरंजन और स्वस्थ वातावरण से वंचित रहे। उनके मंसूबे हैं कि आम कश्मीरी अपने देश के उस सैनिक के खिलाफ पत्थर उठाए, जो उसकी रक्षा के लिए अपने प्राण देने से भी नहीं झिझकता।

पाक के इस पाखंड की पोल खुल चुकी है। अब उसके झांसे में किसी को नहीं आना चाहिए। अब कश्मीर में अन्य सिनेमाघर तो खुलने ही चाहिएं, कश्मीरी नायकों के जीवन पर आधारित फ़िल्में देशभर में दिखाई जाएं। कश्मीर की भाषाओं, साहित्य, संगीत, कला, संस्कृति को प्रोत्साहन मिलना चाहिए। बेशक कश्मीरियत और हिंदुस्तानियत जुदा नहीं हैं। कोई ताला हमें अलग नहीं कर सकता। अब ये ताले खुलने ही चाहिएं।

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