केपी शर्मा ओली: बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले …

पीके शर्मा ओली। स्रोत: ओली के ट्विटर अकाउंट पर पोस्ट किए गए वीडियो से लिया एक चित्र।
पीके शर्मा ओली। स्रोत: ओली के ट्विटर अकाउंट पर पोस्ट किए गए वीडियो से लिया एक चित्र।

‘बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले’ – यह पंक्ति नेपाल के कार्यवाहक प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली पर सटीक बैठती है। पिछले दिनों ओली बेवजह ही भारत से उलझने का मौका ढूढ़ने लगे थे। कभी वे कथित सीमा विवाद का मुद्दा उछालते, कभी वे श्रीराम की जन्मभूमि को लेकर हास्यास्पद दावा करते।

चीन से दोस्ती की पींगें बढ़ाते हुए वे आसमान में उड़ रहे थे लेकिन अब धड़ाम से जमीन पर आ गिरे हैं। यूं कहा जाए तो ज्यादा उचित होगा कि ओली पर सिर मुंडाते ही ओले पड़ने लगे हैं। उन्हें कम्युनिस्ट पार्टी से हटा दिया गया है। उनकी सदस्यता रद्द कर दी गई है।

पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ ओली को आड़े हाथों लेने का कोई मौका नहीं छोड़ते। वे राजधानी काठमांडू में विशाल रैली कर शक्ति प्रदर्शन कर चुके हैं और जनता को यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि ओली ने संसद को जिस तरीके से भंग किया, वह विधि सम्मत नहीं है।

प्रचंड के अनुसार, ओली ने पार्टी और देश के संविधान की मर्यादा को नुकसान पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। वास्तव में ओली ने अपने सदाबहार दोस्त भारत के साथ रिश्ते बिगाड़ने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी। भारत और नेपाल के संबंध आज के नहीं, सदियों से हैं। हमारे लिए काशी और काठमांडू में कोई फर्क नहीं रहा। भारतीय सशस्त्र सेनाओं में नेपालियों ने बहादुरी की मिसाल कायम की है। दोनों देशों में रोटी-बेटी के संबंध हैं।

ओली के सत्ता में आने के बाद उन्होंने खुलकर भारतविरोधी कदम उठाए। सीमावर्ती इलाकों में रेडियो स्टेशनों पर भारतविरोधी गाने चलाए गए। अब तक दोनों देशों की सीमा पर लोग सुकून से रहते थे, पर जून 2020 में नेपाली पुलिस ने गोलीबारी की जिसमें भारतीय नागरिक की मौत हो गई थी।

ओली नेपाली संसद में विवादित नक्शा पारित करवाने के लिए अड़े रहे और वह पारित हुआ। इस नक्शे में भारत की सीमा से लगे रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण लिपुलेख, कालापानी और लिंपियाधुरा इलाकों पर नेपाल की ओर से दावा किया गया था।

ओली द्वारा बरती गई हठधर्मिता भारत-नेपाल के बीच कड़वाहट घोलने और लोगों के भड़काने के लिए पर्याप्त थी। इसके बावजूद भारत सरकार और नागरिकों ने संयम का परिचय दिया।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने लिपुलेख दर्रे तक बनाई गई सड़क के पूरी तरह भारतीय क्षेत्र में होने की बात को रेखांकित करते हुए कहा था कि दुनिया की कोई ताकत भारत-नेपाल के रिश्तों को नहीं तोड़ सकती।

फिर एक-एक कर परतें खुलीं तो असल वजह सामने आ गई। ओली घरेलू राजनीति को लेकर असुरक्षा की भावना से पीड़ित थे। उनकी स्थिति लगातार कमजोर होती जा रही थी। सरकार आर्थिक मोर्चे पर नाकाम हो रही थी। पार्टी में असंतोष बढ़ता जा रहा था।

ओली के बारे में यह धारणा दृढ़ होती गई कि वे चीन के इशारों पर चल रहे हैं और उसके दिशा-निर्देश पर भारत के साथ संबंध खराब करने को आमादा हैं। इस बीच चीनी राजदूत होउ यान्की का नाम सुर्खियों में आया। यह आरोप लगे कि यान्की नेपाल में काफी असर-रसूख रखती हैं, वे शीर्ष राजनेताओं, अधिकारियों को अपने इशारों पर ‘नाच’ नचाती हैं। साथ ही अत्यंत महत्वपूर्ण सरकारी विभागों में सीधी पहुंच रखती हैं। कहा तो यह भी जाता था कि ओली यान्की के ‘जाल’ में फंस गए हैं।

बहरहाल यह नेपाली राजनेताओं और जनता को तय करना चाहिए कि उन्हें भारत जैसे मित्र राष्ट्र, जो हर सुख-दुख में उनके साथ खड़ा रहता है, से संबंध बिगाड़कर किसी ‘और’ से कितना लाभ होगा और उसकी ‘कीमत’ क्या होगी।