दक्षिण भारत राष्ट्रमत के समूह संपादक श्रीकांत पाराशर
दक्षिण भारत राष्ट्रमत के समूह संपादक श्रीकांत पाराशर

श्रीकांत पाराशर
समूह संपादक, दक्षिण भारत राष्ट्रमत

किसी सिनेमा के गीत की ये पंक्तियां देखें-

“मतलब निकल गया तो पहचानते नहीं,
यूं जा रहे हैं, जैसे हमें जानते नहीं।’

यह तो अब याद नहीं है कि यह किस फिल्म के गीत की पंक्तियां हैं परंतु इसमें कोई दो राय नहीं कि गीतकार ने इन पंक्तियों में यथार्थ को इतनी सहजता से शब्दों में पिरोया है कि उनकी तारीफ के लिए स्वतः ही शब्द जुबान पर आ जाते हैं। पता नहीं आदमी की आदत में ऐसी बातें क्यों आसानी से शुमार हो जाती हैं कि आदमी जीवन में हर पल अपना स्वार्थ सर्वोपरि रखने लगता है और ‘अपनों’ का एक दायरा बना लेता है जिनके हितों को वह अपना हित समझता है, बाकी लोगों की अहमियत उसके लिए बस इतनी रह जाती है कि उनसे जो भी फायदा उठाया जा सकता है, उठाए और जब वे निरर्थक हो जाएं तो उन्हें अपने मानस पटल से हटा दे।

जब एक व्यक्ति को किसी दूसरे व्यक्ति से कोई काम निकालना होता है तो वह कुछ भी करने को तत्पर रहता है परंतु जैसे ही काम निकला, उसके हाव-भाव, बोल-चाल, उसका रवैया सब कुछ बदल जाता है। शायद ऐसे ही लोगों के लिए कहा गया है कि मतलब होने पर वे गधे को भी बाप बनाने में और मतलब पूरा हो जाने पर बाप को भी गधा कह दने में कोई शर्म नहीं करते।

जिसके भी साथ ऐसा घटता है, वह छला हुआ महसूस करता है परन्तु अगर कोई भी इस यथार्थ को समझले तो दिल नहीं दुखेगा कि आदमी जब अपना काम निकालने के लिए भगवान से भी छल कपट कर सकता है तो फिर किसी व्यक्ति के साथ स्वार्थी बन जाना तो कोई अचंभेे की बात नहीं। मुझे एक दृष्टांत याद आता है। एक व्यक्ति एक नारियल के पेड़ पर चढ़ता है परंतु आधी दूर पर ही इतना थक जाता है कि उसे भगवान याद आ जाते हैं। वह कहता है, हे प्रभु, मुझे इतनी शक्ति दे कि मैं सब नारियल तोड़कर बाजार में बेच आऊं, मैं 15 रुपए का प्रसाद आपके मंदिर में चढ़ाऊंगा। उसने यह सोचा ही था कि उसमें एक अदम्य उत्साह का संचार हुआ और वह ऊपर चढ़ने लगा। चढ़ता चल गया।

अभी नारियलों से थोड़ी दूरी पर ही था कि उसे लगा, भगवान को 15 रुपए का प्रसाद तो ज्यादा हो जाएगा। वह मन ही मन गुनगुनाया, “प्रभु मेहनत तो मैं कर रहा हूं, बस आप तो केवल हिम्मत ही बंधा रहे हैं, इसलिए आपको 5 रुपए का प्रसाद चढ़ाना काफी होगा। वह मन ही मन सोचता रहा और ऊपर की तरफ बढ़ता रहा।

नारियल के पेड़ पर चढ़ना कोई हंसी खेल नहीं है परन्त वह तो ईश्वर का सहारा ले रहा होता है। अभी वह नारियलों के गुच्छे से एक फिट ही दूर रहा होगा कि उसे लगा अब तो बस वह सब नारियल तोड़ ही लेगा और बाजार में बेचते ही उसके पास पैसे ही पैसे हो जाएंगे। मन में कुटिलता जागी कि अब भगवान को प्रसाद चढ़ाने न चढ़ाने से क्या फर्क पड़ता है। नारियल तो अब मिल ही जाएंगे फिर क्या है। उसने फिर मन के रास्ते से भगवान के यहां दस्तक दी। बोला, भगवान मैं कितनी तकलीफ पाकर इतनी ऊंचाई तक चढ़ा हूं, कितनी बार तो गिरते गिरते बचा, आपको 5 रुपए का प्रसाद तो ज्यादा हो जाएगा, एक रुपए का प्रसाद आपको काफी होगा। उसका इतना कहना था कि पैर फिसला और वह धड़ाम से आ गिरा जमीन पर। जमीन पर गिरते ही उसकी अक्ल ठिकाने आ गईं और कराहते हुए उसने कहा, प्रभु आपने नाहक मेरी बात को सीरियस ले लिया, मैं तो मजाक कर रहा था।

कहने का मतलब है कि जब हम भगवान के साथ भी चालबाजी किए बिना नहीं रह पाते हैं तो फिर किसी आदमी को तो किस खेत की मूली समझेंगे? आज की दुनिया में लोग इतने ज्यादा स्वार्थी हो चले हैं कि उनकी करतूतें देखकर भले लोगों को तो मनुष्य जाति से ही घृणा होने लगे। यह कैसी प्रवृत्ति है कि जब हमें किसी से काम निकलवाना है तो हम उसके गुणगान करतेे थकते नहीं। उसमें अवगुण भी हों तो हमें वह व्यक्ति गुणों की खान दिखाई देता है। हम अपना मतलब साधते रहते हैं और जब हमें लगता है कि इस गन्ने में अब रस नहीं रहा तो उसे फैंक देते हैं।

स्वार्थी व्यक्ति अपना काम निकालने के लिए हर हथकंडे अपनाता है परन्तु काम होने के बाद उसे उसी व्यक्ति की शक्ल भी नहीं सुहाती,जो मददगार रहा। जिसके घर पर स्वार्थी ने घंटों बिताए हों, काम हो जाने के बाद उसके घर की गली भी उसे काटने दौड़ती है। जब मतलब होता है तो मतलबी व्यक्ति फोन कर करके अगले व्यक्ति के प्रति इतनी आत्मीयता दर्शाता है मानो उससे ज्यादा घनिष्ठ व्यक्ति और कोई नहीं। अपना काम हो जाने के बाद वह उसे भूल जाता है तो कोई बात नहीं। भूले भटके अगर मदद करने वाला व्यक्ति, जिसकी मदद करता रहा उस स्वार्थी व्यक्ति को कभी याद कर ले तो वह स्वार्थी उसके फोन नंबर देखकर अपना मोबाइल स्विच ऑफ कर देगा क्योंकि उससे अब क्या लेना देना है।

ऐसे मतलबी आदमी भले ही अपने आपको ज्यादा चतुर समझते हों परंतु काठ की हांडी बार-बार चूल्हे नहीं चढ़ती। मदद करने वाले भी कभी तो असलियत पहचान ही जाते हैं। कई बार आदमी इतना ज्यादा स्वार्थी हो जाता है कि वह अपने सच्चे सहयोगियों को दरकिनार कर तात्कालिक सुख और लाभ के लालच में ऐसे लोगों का गुणगान शुरू कर देता है जहां से फिर कोई लाभ की संभावना होती है। ऐसे अति चतुर लोगों को सीख देने का भी कोई औचित्य नहीं होता। उन्हें परिस्थितियों के थपेड़े ही ठीक राह पर लाते हैं और भगवान ही उन्हें सही पाठ पढ़ाते हैं। जब तक परिस्थितियां उन्हें सबक नहीं सिखातीं तब तक वे अपनी सुविधा के अनुसार मित्र बदलते रहते हैं, मार्गदर्शक बदलते रहते हैं, अपना चोला बदलते रहते हैं, व्यवहार बदलते रहते हैं।

मतलबी लोग कितने होंशियार होते हैं, इसका अंदाजा आपको शायर अतीक इलाहाबादी की एक गजल के इन शेरों पर गौर फरमाने से हो जाएगा-

उसे तो आता है, मतलब निकालने का हुनर
वो गुफ्तगू में बहुत, जी-जनाब रखता है।
वो खुलने देता नहीं, दिल का हाल चेहरे से,
न पढ़ सके कोई, ऐसी किताब रखता है।