प्रयागराज का ऐतिहासिक घंटाघर
प्रयागराज का ऐतिहासिक घंटाघर

प्रयागराज/भाषा। पिछली शताब्दी के शुरू में शहर के व्यस्त चौराहे पर बनाया गया विशाल घंटाघर 30 साल बाद एक बार फिर समय बताएगा। प्रयागराज नगर निगम ने इस ऐतिहासिक घंटाघर की घड़ी और घंटे को चालू हालत में लाने की कोशिश तेज कर दी है। इसके कलपुर्जे मिलने में दिक्कतें आ रही हैं, लेकिन उम्मीद है कि अक्टूबर तक यह चालू हालत में होगा।

प्रयागराज स्थित चौक घंटाघर भारत के सबसे पुराने बाजारों में से एक है और मुगलों की परंपरागत स्थापत्य और निर्माण कला का नमूना है। इसे लखनऊ के घंटाघर के बाद उत्तर प्रदेश का दूसरा सबसे पुराना घंटाघर कहा जाता है। इसके खम्भों पर रोमन नक्काशी की बहुत सुंदर कलाकृतियां उकेरी गई हैं, जो सौ साल बीत जाने पर धुंधली भले हो गई हों, लेकिन उनकी खूबसूरती में कहीं कोई कमी नहीं आई।

साल 1881 में लखनऊ में बना घंटाघर देश का सबसे ऊंचा घंटाघर है। यह ऐसा समय था जब अंग्रेज अफसरों के अलावा घड़ी किसी के पास नहीं होती थी। कृषि प्रधान देश में सूरज के उगने और छिपने से वक्त का अंदाजा लगाया जाता था, लेकिन अंग्रेज हुकूमत के सरकारी दफ्तरों और फैक्ट्रियों में काम करने वाले लोग समय पर अपने काम पर पहुंचें, इसके लिए शहर के बीचोंबीच व्यस्त चौराहे पर विशाल घंटाघर बनवाने का चलन शुरू हुआ।

नगर निगम के अधिशासी अभियंता अजय सक्सेना ने बताया कि चौक स्थित घंटाघर की घड़ी पिछले 30 साल से खराब पड़ी है जिसे ठीक कराने की कोशिश नगर निगम ने की, लेकिन इसके कई कल-पुर्जें लापता होने से इसे ठीक कराना चुनौतीपूर्ण कार्य हो गया। उन्होंने बताया कि अब इस काम का जिम्मा मुंबई की एक कंपनी को सौंपा गया है।