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‘आज़ाद’ हुए आज़ाद!
आज़ाद का एक शिकवा यह भी है कि वे पार्टी के पुनरुत्थान के लिए पंचमढ़ी (1998), शिमला (2003) और जयपुर (2013) में हुए मंथन में शामिल रहे हैं, लेकिन उनकी सलाह पर ध्यान ही नहीं दिया गया
 
साल 2014 के लोकसभा चुनावों से कांग्रेस का प्रदर्शन गिरता जा रहा है

ग़ुलाम नबी आज़ाद आखिरकार कांग्रेस से ‘आज़ाद’ हो ही गए। आमतौर पर वरिष्ठ नेता पार्टी में खींचतान की स्थिति होने पर किसी पद से इस्तीफा देते हैं, लेकिन आज़ाद ने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। सत्तर के दशक में कांग्रेस में आए आज़ाद ने लंबा अरसा पार्टी में बिताया है। उन्होंने इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी समेत पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं के साथ काम किया। केंद्र में मंत्री और जम्मू-कश्मीर में मुख्यमंत्री रहे। उन्हें कांग्रेस नेतृत्व के निकटतम नेताओं में से एक माना जाता है। फिर अचानक क्या हुआ कि आज़ाद ने पांच पन्नों का एक पत्र सोशल मीडिया पर पोस्ट कर कांग्रेस का ‘हाथ’ छोड़ दिया?

आज़ाद का इस्तीफा कोई साधारण घटना नहीं है। उन्होंने इस्तीफे में जो कुछ लिखा है, उससे सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि अपने दिल की भड़ास बयान की है। आज़ाद ने राहुल गांधी पर पार्टी के अंदर परामर्श तंत्र को खत्म करने का आरोप लगाया है। उन्होंने राहुल गांधी द्वारा सरकारी अध्यादेश को पूरे मीडिया के सामने फाड़ने को ‘अपरिपक्वता’ का उदाहरण बताया, जिस पर पूर्व में भी कई नेता नाखुशी जता चुके हैं।

आज़ाद का एक शिकवा यह भी है कि वे पार्टी के पुनरुत्थान के लिए पंचमढ़ी (1998), शिमला (2003) और जयपुर (2013) में हुए मंथन में शामिल रहे हैं, लेकिन उनकी सलाह पर ध्यान ही नहीं दिया गया। इसलिए लागू करना तो दूर की बात है। साल 2014 के लोकसभा चुनावों से कांग्रेस का प्रदर्शन गिरता जा रहा है। बल्कि उससे कुछ पहले, 2013 के आखिर में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में हुए विधानसभा चुनावों ने कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी बजा दी थी।

आज़ाद इस बात से खफा हैं कि 2014 के लोकसभा चुनावों में पार्टी को ‘पुनर्जीवित’ करने के लिए जो विस्तृत कार्य योजना तैयार की गई थी, वह तब से कांग्रेस कमेटी के स्टोररूम’ में पड़ी है। हालांकि यह पहला मौका नहीं है, जब किसी नेता ने कांग्रेस नेतृत्व पर ऐसा आरोप लगाया हो कि उनकी सुनी नहीं जाती या समय पर महत्वपूर्ण फैसले नहीं लिए जाते, लेकिन आज़ाद का कथन चौंकाने वाला है कि ‘आपके (सोनिया गांधी) पास सिर्फ नाम का नेतृत्व है, सभी महत्वपूर्ण फैसले या तो राहुल गांधी लेते हैं, या फिर इससे भी बदतर स्थिति में उनके सुरक्षाकर्मी और निजी सहायक लेते हैं’ - कांग्रेस को आत्ममंथन करना होगा कि एक वरिष्ठ नेता अपनी पार्टी पर ऐसे आरोप क्यों लगा रहे हैं। किसी छोटे-से संगठन में भी फैसले लेने के लिए पूरा तंत्र होता है, जिससे होते हुए मुद्दे पर चर्चा होती है। फिर फैसले लागू किए जाते हैं।

अगर देश की सबसे पुरानी पार्टी के बारे में यह कहा जा रहा है तो यह उसके लिए शुभ नहीं है। अब तक तो कांग्रेस पर परिवारवाद का आरोप लगता था, अब आज़ाद के बयान से प्रतिपक्ष को यह कहने का अवसर मिलेगा कि कांग्रेस में फैसले लेने और लागू करने का तंत्र ही अनुपस्थित है! कांग्रेस को मंथन करना होगा कि उसके वरिष्ठ नेता क्यों उसे छोड़-छोड़कर जा रहे हैं। जिन्होंने पूरी उम्र पार्टी में खपाई है, वे उसका साथ छोड़ रहे हैं तो इसका अर्थ यही है कि पार्टी को तुरंत बड़े सुधारों की आवश्यकता है।

हाल में कपिल सिब्बल ने पार्टी से नाता तोड़ लिया था। ज्योतिरादित्य सिंधिया, सुनील जाखड़, हार्दिक पटेल, जितिन प्रसाद ये कुछ जाने-माने नाम हैं, जो कांग्रेस से अलग हो गए। धरातल पर भी कई कार्यकर्ता पार्टी से रास्ता अलग कर चुके हैं। कभी देश पर एकछत्र राज करने वाली कांग्रेस आज इस स्थिति में क्यों पहुंच गई है, पार्टी नेतृत्व इस पर मंथन करे और अपनी रीति-नीति में सुधार करे। सशक्त लोकतंत्र के लिए सत्ता पक्ष के साथ ही विपक्ष का भी सशक्त होना अनिवार्य है। इसके लिए कांग्रेस आंतरिक सुधार को प्राथमिकता देते हुए जनहित के मुद्दों पर ध्यान दे।

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