संपादकीय: नसीहत न दें ब्रिटिश सांसद

दक्षिण भारत राष्ट्रमत में प्रकाशित संपादकीय
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भारत के कृषि कानूनों पर ब्रिटिश संसद में चर्चा और बयानों की बौछार अस्वीकार्य एवं अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन है। इस पर भारत द्वारा विरोध जताया जाना स्वाभाविक एवं उचित है। ब्रिटेन कौन होता है जो हमें हमारे कृषि कानूनों पर कोई नसीहत दे? ये कानून भारतीय संसद में बने हैं, भारत के राष्ट्रपति द्वारा हस्ताक्षरित हैं, उच्चतम न्यायालय इन पर सुनवाई कर रहा है और कुछ लोग इसका विरोध कर रहे हैं — यह पूरी तरह से भारत का मामला है और इसे सुलझाने में हम पूरी तरह सक्षम हैं। ब्रिटिश संसद को इस बात पर चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है।

केंद्र सरकार ने यह उचित ही किया कि ब्रिटिश हाई कमिश्नर को तलब कर लिया और उसकी संसद में हुई चर्चा पर कड़ी आपत्ति दर्ज करा दी। अगर कृषि कानूनों के विरोध के नाम पर बने वातावरण पर गौर करें तो एक-एक कर कई लोग भारत को उपदेश देने के लिए सामने आ रहे हैं। पाकिस्तान जैसा आतंकी मुल्क तो अनिष्ट की आशा कर इस बात के इंतजार में है कि कब कुछ बड़ा ​घटित हो और उसे भारत को घेरने का मौका मिले। कनाडा के प्रधानमंत्री भी बयानवीर बनने के प्रयास में कूद पड़े थे। इसके बाद ग्रेटा, मिया खलीफा जैसे धुरंधर क्रांतिकारियों की बारी आई। अब ब्रिटेन के राजनेताओं को भारतीय किसानों की चिंता सताए जा रही है। निकट भविष्य में कोई और भारत को किसानहितों पर उपदेश देने के लिए प्रकट हो जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

पश्चिमी राजनेताओं, कार्यकर्ताओं ने बड़ी चालाकी से खुद की ऐसी छवि बनाई है कि वे दुनिया में सबसे ज्यादा बुद्धिमान हैं। वे हर बात का इल्म रखते हैं। वे किसी भी विषय पर राय दे सकते हैं और वे मानवता के एकमात्र रक्षक हैं। जिन ब्रिटिश संसदों ने भारत के कृषि ​कानूनों की आलोचना की है, उनसे यह जरूर पूछा जाना चाहिए कि ‘आप में से कितने लोगों ने इसे पूरा पढ़ा है?’ कहीं आपके द्वारा की जा रही आलोचना का आधार सोशल मीडिया में शेयर की जा रही वह जानकारी तो नहीं जो इन दिनों गलत तथ्यों और भ्रामक आंकड़ों के साथ फैलाई जा रही है?

अगर इन कानूनों में कहीं सुधार, संशोधन की गुंजाइश होगी तो भारत सरकार इसे करने में सक्षम है। क्या इस मामले में हम ब्रिटेन से मार्गदर्शन चाह रहे हैं? यह पूरी तरह से भारत का निजी मामला है, जिसमें कुछ ताकतें अकारण ही पक्ष बनने को आतुर हैं। आपको किसने निमंत्रण भेजा है? पाकिस्तान सहित पश्चिमी देशों में कुछ ऐसा ही वातावरण तब बना था जब भारत सरकार ने अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निष्प्रभावी कर दिया था। उस समय भारत की छवि खराब करने के लिए यह कुतर्क खूब दिया गया कि यह कदम कश्मीर को ‘गुलाम’ बनाने के लिए है।

इतिहास गवाह है, कश्मीर को वास्तविक आज़ादी इस अनुच्छेद को हटाने के बाद ही मिली। आज वहां लोग चैन की सांस ले रहे हैं, बेहतर भविष्य की उम्मीद कर रहे हैं। ​पश्चिमी देशों में इस पर आज तक हंगामा मचा हुआ है। क्या भारत सरकार के इस कदम से कश्मीर का अहित हुआ? वास्तव में भारत के खिलाफ वैश्विक स्तर पर ऐसे कई व्यक्ति, संगठन सक्रिय हैं जिनका पूरा जोर इस पर है कि यहां कोई सुधार नहीं हो, पुराना ढर्रा चलता रहे और लोग समस्याओं से त्रस्त रहें। खेद है कि इस षड्यंत्र में ऐसे देश भी शामिल हैं जिन्हें हम मित्र समझते हैं। जो ब्रिटिश सांसद हमारे किसानों के हितैषी बनकर सामने आ रहे हैं, उन्हें एक बार भारत आकर उन स्थानों का दौरा करना चाहिए जो उनके पूर्वजों के क्रूर कर्मों के साक्षी हैं।

अगर वे संपूर्ण भारत का भ्रमण करने में असमर्थ हैं तो सिर्फ ​जलियांवाला बाग चले जाएं। यहां किस तरह जनरल डायर ने निहत्थे किसानों पर गोलियां चलवाकर नरसंहार कराया था। उन गोलियों के निशान आज तक मौजूद हैं। क्या ब्रिटेन के प्रधानमंत्री इस पर माफी मांगने का हौसला दिखाएंगे? अगर आपको ​भारत की इतनी ही चिंता है तो वह संपूर्ण धन-संपत्ति वापस करें जो आपके पूर्वज यहां डाका डालकर ले गए थे। इससे दुनिया में एक अच्छा संदेश जाएगा कि ब्रिटिश सांसद ईमानदारी की राजनीति करते हैं, भले ही उनके पूर्वज लालची प्रवृत्ति के थे। भारत की जनता भी इसे हाथोंहाथ लेगी और आपको सच्चा मित्र स्वीकार करेगी। अगर यह नहीं कर सकते तो अपना देश संभालें। आपके हाथ तो भारतीयों के खून से इतने रंगे हुए हैं कि उन्हें धोने से थेम्स भी इन्कार कर देगी।