संपादकीय: घुसपैठियों पर हो कार्रवाई

दक्षिण भारत राष्ट्रमत में प्रकाशित संपादकीय
दक्षिण भारत राष्ट्रमत में प्रकाशित संपादकीय

जम्मू में अवैध रूप से रह रहे 168 रोहिंग्याओं को जेल भेजे जाने के मामले में प्रशासन की भूमिका सराहनीय है। सबसे पहले तो यह विचारणीय है कि ये लोग म्यांमार से भारत में घुसपैठ कर इतनी दूर कैसे आ गए, वह भी जम्मू में! यहां पाक प्रायोजित आतंकवाद पहले ही समूचे राष्ट्र के लिए खतरा बना हुआ है। ऐसे में इतनी बड़ी तादाद में घुसपैठियों का यहां बस जाना खतरे की घंटी है। आखिर हम कब तक ऐसे ज्वलंत विषयों को लेकर उदासीन बन रहेंगे?

अगर किसी को भारत आना है तो कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए, वीजा लेकर आए। यूं चोरी-छिपे जहां मर्जी हुई, कॉलोनी बना लेने को बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए। हम जम्मू-कश्मीर में पहले ही आतंकवाद से लड़ रहे हैं। अब तक हजारों जवानों, नागरिकों को गंवा चुके हैं। फिर ऐसे संवेदनशील स्थान पर दूर-दराज से आए घुसपैठियों के बसने पर नरमी स्वीकार्य नहीं है।

सिर्फ जम्मू ही नहीं, देश में जहां कहीं ऐसे लोग जो अवैध रूप से रह रहे हैं, उनकी फौरन पकड़ होनी चाहिए। जब प्रशासन ऐसे तत्वों के खिलाफ कार्रवाई कर रहा है तो इनके साथ सहानुभूति जताने वाले तुरंत मैदान में कूद पड़ेंगे। वे कहेंगे कि इन्हें कहां भेजेंगे, इससे तो अच्छा है कि यहीं कहीं जमीन देकर बसा दें। इसके लिए वे विभिन्न प्रकार के कुतर्क देते हैं। कोई इनसे पूछे कि ‘ऐसी तत्परता तब क्यों नहीं दिखाते जब सिंध से कोई हिंदू अपना सबकुछ लुटाकर भारत आना चाहता है?’

‘यह गंभीरता उस वक्त कहां गायब हो जाती है जब किसी सिख की बेटी पेशावर में अगवा कर ली जाती है?’ तब मानवाधिकारों की डिक्शनरी गायब हो जाती है! ये स्वनाम धन्य ‘क्रांतिकारी’ उस वक्त भी अदृश्य हो जाते हैं जब लाहौर के किसी चर्च में धमाका होता है और पाकिस्तानी कट्टरपंथी, ईसाई बच्चियों पर ईशनिंदा का झूठा मुकदमा कर देते हैं। बौद्ध, जैन, पारसियों की तो कहीं चर्चा ही नहीं होती। इससे सीएए का महत्व स्वत: सिद्ध हो जाता है। वहीं जम्मू की यह घटना इस बात पर जोर देती है कि देश में एनआरसी लाया जाना चाहिए।

हमारे कुछ ‘बुद्धिजीवियों’ के क्या कहने! जब कभी घुसपैठियों को निकालने की बात होती है, वे फौरन मोर्चा संभाल लेते हैं। पश्चिमी देशों के कई संगठन उनकी हां में हां मिलाते हैं। उसके बाद भावुकता पैदा करने वाले शब्दों की बौछार शुरू हो जाती है, जिससे कुछ और लोग उनके साथ हो लेते हैं। ये दलील देते हैं कि भारत ने तो सबको शरण दी है… अगर कुछ और लोग आ जाएंगे तो क्या हो जाएगा? … अगर भारत इनको स्वीकार नहीं करेगा तो इतिहास हमें क्या कहेगा… यह तो भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों की उपेक्षा है इत्यादि! तो क्या भारत को यह घोषणा कर देनी चाहिए कि हम अपनी सीमाएं खोल रहे हैं, दुनिया में जिसकी मर्जी हो, वह अपना थैला उठाकर यहां आ जाए! क्या देश ऐसे चलेगा?

इनसे जरा पूछो तो, जो अमेरिका मानवाधिकार का ढिंढोरा पीटता है, वह भारत से बिना वीजा और वैध दस्तावेजों के कितने लोगों को स्वीकार करेगा? सीधी सी बात है, कोई भी विवेकशील देश ऐसा नहीं करेगा। उसकी सर्वोच्च प्राथमिकता अपने नागरिकों के जीवन एवं हितों की रक्षा करना है। अगर यूं किसी को भी आने और बस जाने की इजाजत दे दी जाए, तो भविष्य में यह कदम आत्मघाती होगा, जिसके नतीजे सबको भुगतने होंगे।

इन पंक्तियों का यह आशय कदापि नहीं है कि भारत को दया, मैत्री, करुणा जैसे आदर्शों को भूल जाना चाहिए। भारत इनसे एक इंच भी नहीं हटेगा, परंतु देश को यह जानने का पूरा अधिकार है कि उसकी भूमि पर कौन रह रहा है। भारत के समस्त नागरिक उसके अपने हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है। जो अवैध रूप से आया और यहां जड़ें जमाने की कोशिश कर रहा है, उसके खिलाफ वही कार्रवाई करनी होगी जो एक संप्रभु राष्ट्र को अपने नागरिक हितों की सुरक्षा के लिए करनी चाहिए।