डिजिटल की डगर पर भारतीय अर्थव्यवस्था

फोटो स्रोत: PixaBay
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भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (एनपीसीआई) की एक रिपोर्ट बेहतर भविष्य के लिए उम्मीद पेश करती है। इसमें बताया गया है कि भारत डिजिटल पेमेंट की राह पर आगे बढ़ता जा रहा है। इसमें लगातार बढ़ोतरी हो रही है। इससे जाहिर होता है कि लोगों को भुगतान का यह तरीका पसंद आ रहा है। देश की अर्थव्यवस्था को देर-सबेर इसके फायदे जरूर मिलेंगे। रिपोर्ट के अनुसार, फोन पे, गूगल पे और पेटीएम जैसे विकल्प डिजिटल पेमेंट के क्षेत्र में सबसे ज्यादा पसंद किए जा रहे हैं, जिनसे करोड़ों की रकम भेजी जा रही है।

यही नहीं, बिजली, पानी, गैस, फोन समेत तमाम जरूरी सुविधाओं, सेवाओं के बिल भी डिजिटल माध्यम से जमा किए जा रहे हैं। अगर यह कहा जाए तो गलत नहीं होगा कि डिजिटल पेमेंट इसी तरह लोकप्रिय होता रहा तो आने वाले समय में लोगों को बिल भुगतान जैसे कार्यों के लिए लंबी लाइनों में लगने से निजात मिल जाएगी।

उक्त विकल्पों में फोनपे शीर्ष पर है जिससे 96 करोड़ से ज्यादा ट्रांजेक्शन हुए हैं। यह रकम दो लाख करोड़ से थोड़ी ही कम (1.92 लाख करोड़) है। अगर कुल डिजिटल भुगतान की बात करें तो पिछले साल मई में यह 2.18 लाख करोड़ था। इस रकम का कुल 1.23 अरब बार लेनदेन से आदान—प्रदान किया गया। यह आंकड़ा साल के आखिर तक पहुंचते 4.16 लाख करोड़ रुपए हो गया। इसके लिए लोगों ने 2.23 अरब लेनदेन किए।

देश ने सिर्फ सात महीनों में ही यह उपलब्धि हासिल कर ली। साल 2021 में इसकी बढ़त जारी है। नए साल की जनवरी में ही 4.31 लाख करोड़ रुपए का डिजिटल माध्यम से भुगतान हो चुका है। इसके लिए 2.30 अरब लेनदेन हुआ है। अगर एक माह के अंतर का आकलन करें तो देश ने नए साल में दाखिल होते ही 0.15 लाख करोड़ रुपए की बढ़त ले ली है।

इसके लिए लेनदेन में 0.07 अरब की वृद्धि हुई है। उम्मीद की जानी चाहिए साल 2021 के आखिर तक भारत इन आंकड़ों को बहुत पीछे छोड़ते हुए नया कीर्तिमान रचेगा। डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा देने की दिशा में नवंबर 2016 में हुई नोटबंदी सबसे बड़ा कदम था। उस समय अक्सर यह कहा जाता था कि भारत डिजिटल पेमेंट को नहीं अपना सकता, चूंकि यहां के लोग परंपरागत तौर-तरीकों में ही ज्यादा यकीन रखते हैं।

अगर कहीं कुछ लोग इसे अपनाएंगे भी, तो वो महानगरों में रहने वाले, अंग्रेजी बोलने वाले, महंगी गाड़ियों में घूमने वाले और पार्टियां करने वाले लोग होंगे। अब छोटे शहरों, कस्बों और गांवों तक में लोग डिजिटल पेमेंट करते मिल जाते हैं। देश की जनता ने पांच साल से भी कम समय में इस धारणा को गलत साबित कर दिखाया। ​विशेषज्ञ कहते हैं कि जो देश भुगतान के मामले में जितना आधुनिक होता है, उसकी अर्थव्यवस्था की मजबूती, स्वच्छता की संभावनाएं उतनी ही बढ़ती जाती हैं।

इससे एक फायदा यह होगा कि मुद्रा का एक बड़ा हिस्सा बैंकिंग प्रणाली में आएगा। इससे तरलता में वृद्धि होगी और यह रकम बाजार की मांग को बढ़ाएगी। सरकारी दफ्तरों के कम से कम चक्कर लगाने होंगे। एक हद तक भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी। कालाधन रखने की प्रवृत्ति हतोत्साहित होगी। इसके अलावा, इतनी बड़ी तादाद में नोटों की छपाई, सिक्कों की ढलाई का खर्च बचेगा। इनका एक निश्चित समयावधि के बाद नवीनीकरण करना होता है।

डिजिटल पेमेंट संसाधन व समय बचाएगा। इस माध्यम से एजेंसियों के लिए यह पता करना ज्यादा आसान होगा कि रुपया कहां आ रहा है और किधर जा रहा है। इसका रिकॉर्ड रखने में आसानी होगी, जो आर्थिक नीतियां बनाने में मदद करेगी। करचोरी, देश विरोधी एवं आतंकी गतिविधियों को वित्त पोषण जैसे मामलों में ठोस सबूत जुटाए जा सकेंगे।

परंपरागत नकद भुगतान की अपनी सीमाएं हैं। इससे अर्थव्यवस्था अपने सामर्थ्य का पूरा उपयोग नहीं कर पाती और उसकी रफ्तार कम ही रहती है। वहीं, डिजिटल पेमेंट की गति बिजली की तरह है। यह अर्थव्यवस्था में नई ऊर्जा का संचार कर सकती है। कोरोना काल में डिजिटल पेमेंट ने नई बुलंदियां हासिल कीं। अब जरूरी है कि सरकार इसे प्रोत्साहित करने के लिए और आसान, आकर्षक व आम जनता के लिए फायदेमंद कदम उठाए।

साथ ही, इस माध्यम में सुरक्षा एक बड़ा मसला है। ऑनलाइन धोखाधड़ी रोकने के लिए सिस्टम को मजबूत किया जाए। डिजिटल पेमेंट के प्रति लोगों का भरोसा बढ़ाया जाए। प्राय: लोग इस वजह से भी डिजिटल पेमेंट करने से हिचकतें हैं कि कहीं उनके साथ कोई धोखाधड़ी न हो जाए। इसके लिए अनुकूल माहौल बनाने की जरूरत है। भारत की जनता में इतना सामर्थ्य है कि एक साल की अवधि में ही, जनवरी 2022 तक डिजिटल पेमेंट के आंकड़ों में इससे भी बड़ा उछाल आ सकता है।