भारतीय भाषाओं का इंटरनेट पर डंका, फिर उच्च शिक्षा में उपेक्षा क्यों?

दक्षिण भारत राष्ट्रमत में प्रकाशित संपादकीय
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने असम दौरे के समय स्थानीय भाषाओं में शिक्षा देने वाले संस्थानों के महत्व को रेखांकित किया है। उनके द्वारा यह कहा जाना कि ‘हर राज्य में स्थानीय भाषा में शिक्षा मुहैया कराने वाला कम से कम एक मेडिकल कॉलेज और एक प्रौद्योगिकी संस्थान स्थापित करना मेरा सपना है’ — समय की जरूरत है।

वास्तव में यह कार्य आजादी के बाद ही शुरू कर दिया जाना चाहिए था। इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि अंग्रेजी को हटा देना चाहिए। स्थानीय भाषाओं में शिक्षण के अनेक फायदे हैं। जब व्यक्ति कुछ सोचता है, तो ज्यादातर मामलों में वह उसकी मातृभाषा ही होती है। इससे विषय की ग्रहण क्षमता बढ़ती है, तर्कशक्ति में वृद्धि होती है और प्रयोगशीलता बेहतर होती है।

हमें इस भ्रम में नहीं होना चाहिए कि ज्ञान सिर्फ अंग्रेजी से ही मिल सकता है और यही भाषा समृद्धि व सफलता की गारंटी है। ऐसे कई देश हैं जहां मेडिकल, इंजीनियरिंग से लेकर कानून, फैशन डिजाइनिंग, प्रबंधन समेत लगभग सभी पाठ्यक्रम उनकी भाषाओं में हैं। रूस, इटली, जर्मनी, जापान, चीन, दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने अपनी भाषाओं के दम पर प्रगति की है।

यहां स्कूल, कॉलेजों में अपनी भाषा में ऐसी पीढ़ी तैयार होती है जो देश की समस्याओं, जरूरतों को बेहतर ढंग से समझ पाती है और उसी के अनुसार हल ढूंढ़ती है। वहीं, भारत में ग्रामीण परिवेश से आने वाले कई युवाओं के लिए उच्च शिक्षा के दौरान अंग्रेजी किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होती। वे कक्षाओं में सवाल पूछने से भी हिचकते हैं।

अगर उच्च शिक्षा स्थानीय भाषाओं में हो, तो ऐसे विद्यार्थियों के लिए बड़ी आसानी होगी जो अंग्रेजी में उतनी सहजता अनुभव नहीं कर पाते, जितनी कि वे अपनी मातृभाषा में कर सकते हैं। यहां स्पष्ट करना आवश्यक है कि उक्त पंक्तियों में अंग्रेजी का विरोध नहीं किया गया है। आज अंग्रेजी के महत्व को कोई नहीं नकार सकता। यही वह भाषा है जिसके माध्यम से आज विश्व से संवाद किया जा सकता है।

भले ही यह विदेशी भाषा है, लेकिन इसमें पारंगत होना बहुत जरूरी है। आज सभी पाठ्यक्रम अंग्रेजी माध्यम से उपलब्ध हैं और ये जारी रहने चाहिए। इसके सा​थ हमें यह विचार करना चाहिए कि देश में एक भाषा के तौर पर विद्यार्थियों को अंग्रेजी सिखाना कितना सफल हुआ।

प्राय: यह देखने में आता है कि अंग्रेजी की स्कूली किताबें बच्चों में रटने की प्रवृत्ति को ज्यादा बढ़ावा देती हैं। ग्रीडी डॉग, थ्रस्टी क्रो, छुट्टी के लिए प्रार्थना पत्र — ऐसी तमाम बातें इसलिए पढ़ाई/पढ़ी जाती हैं ताकि परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाएं, अच्छे अंक आ जाएं। यह शिक्षण विधि विद्यार्थियों को खास फायदा नहीं पहुंचा सकती।

इस पद्धति से ज्ञान अर्जित करने वाले विद्यार्थियों में उनकी संख्या बहुत कम होती है जो आसानी से अंग्रेजी में संवाद कर सकें। विद्यालयों में अंग्रेजी इस तरह पढ़ाई जानी चाहिए कि विद्यार्थी इस भाषा में निपुण हो सकें, वे सरलता से संवाद कर सकें, स्थानीय भाषा में अनुवाद कर सकें और जटिल से जटिल विषय को समझ सकें।

इसके साथ ही हमें उस परंपरा पर भी पुनर्विचार करना चाहिए जो सिर्फ अंग्रेजी में उच्च शिक्षा के द्वार खोलती है, जहां हमारी भाषाओं के लिए वह सम्मान नहीं, उज्ज्वल भविष्य की वैसी संभावनाएं नहीं जिन पर अंग्रेजी का एकाधिकार है।

भारत तो भाषाओं के मामले में अत्यंत समृद्ध है। हिंदी, कन्नड़, तमिल, तेलुगु, मलयालम, मराठी, गुजराती, बांग्ला, असमी, पंजाबी … सभी भाषाएं हमारी ताकत हैं। इनमें साहित्य का विशाल भंडार है। जब इंटरनेट पर हमारी भाषाओं के नाम का डंका बज रहा है तो ये उच्च शिक्षा के माध्यम के रूप में उपेक्षित क्यों रहें? जहां तक अंग्रेजी का सवाल है, तो भारत के युवाओं को इसमें इतना निपुण होना चाहिए कि ब्रिटेन और अमेरिका के युवा उनसे अंग्रेजी सीखने की प्रेरणा लें।