संपादकीय: इमरान के थोथे उपदेश

दक्षिण भारत राष्ट्रमत में प्रकाशित संपादकीय
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पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान द्वारा भारत को यह समझाना कि ‘पाक के साथ शांति बनाए रखेंगे तो भारत को आर्थिक लाभ मिलेगा’ – अत्यंत हास्यास्पद है। यह तो वही बात हुई कि ‘स्याणी चाली सासरै, बावळी देवै सीख’। जो उपदेश इमरान आज दे रहे हैं, वह भारत पिछले सात दशकों से पाकिस्तान को समझा चुका है। एक बार नहीं, कई बार।

सन् 1947 में जब भारत का बंटवारा हुआ तो हमारा तत्कालीन राजनीतिक नेतृत्व यही चाहता था कि कहीं से सहयोग और सद्भाव की संभावना तलाशी जाए। लेकिन हम पाकिस्तान से बार-बार धोखा खाते रहे। यह सिलसिला नेहरू से शुरू होकर वाजपेयी तक जा पहुंचा।

वाजपेयी को लाहौर बस यात्रा के तोहफे में कारगिल युद्ध मिला। नरेंद्र मोदी ने भी पाकिस्तान से रिश्ते सुधारने की कम पहल नहीं की थी। वे पहले कार्यकाल के लिए प्रधानमंत्री बने तो नवाज शरीफ को शपथग्रहण में बुलाया। फिर बिना तय कार्यक्रम के काबुल से दिल्ली आते हुए नवाज के यहां शादी में शिरकत करने गए और बहुत सद्भाव के वातावरण में मुलाकात करके आए। इससे यहां उनकी तीखी आलोचना हुई। पर मोदी को बदले में पठानकोट, उरी और पुलवामा मिला।

अपने पूर्ववर्ती प्रधानमंत्रियों की तुलना में मोदी बहुत जल्दी समझ गए कि पाकिस्तान के साथ नम्रता की नीति कारगर सिद्ध नहीं हो सकती है। इसके बाद सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक में भारतीय सेनाओं का पराक्रम पूरी दुनिया ने देखा। इतना सब होने के बाद अब इमरान भारत को ही शांति का उपदेश दे रहे हैं। अच्छा होता कि वे राव​लपिंडी का रुख करते और फौज के मुख्यालय में यही बात दोहराते, चूंकि अशांति की जड़ तो वहीं है।

अगर मौजूदा हालात में ऐसा मुमकिन नहीं और इमरान को अपनी ‘नौकरी’ गंवाने का डर है तो हाफिज सईद, मसूद अजहर, लखवी, दाऊद इब्राहिम के पास जाएं और उन्हें यह मानवता का पाठ पढ़ाएं। शायद उनमें से किसी एक का हृदय परिवर्तन हो जाए और उसे अपने गुनाहों का सच्चा पछतावा हो। इससे दुनिया में कम से कम एक आतंकवादी कम हो जाएगा।

इमरान की यह दलील भी बचकानी है कि ‘इससे भारत को पाकिस्तानी भू-भाग के रास्ते मध्य एशिया में सीधे पहुंचने में मदद मिलेगी’। अगर इमरान खान भारत को रास्ता देने के लिए बड़ा दिल दिखाना चाहते हैं तो सबसे पहले पीओके खाली करें। वहां से अपनी फौज का बोरिया-बिस्तर उठाएं और आतंकवादियों के डेरे खत्म करें। अगर भारत को रास्ता ही चाहिए तो वह सबसे पहले अपनी जमीन से लेगा। पीओके पर पाक का अवैध कब्जा है। इस भूमि का महाराज हरि सिंह ने विधिपूर्वक भारत में विलय कर उसके शासनाधिकार सौंप दिए थे।

पाकिस्तान ने सीपेक के लिए यह इलाका चीन को बेच दिया और आज उसके वाहन यहां से गुजर रहे हैं। भारत इस भूमि को पुन: प्राप्त करने के लिए संकल्पबद्ध है। पाकिस्तान यहां घुसपैठिया और अवैध कब्जाधारी है। भारत की भूमि पर आक्रमण कर उस पर कब्जे के बाद भारत को ही यह कहना कि पाकिस्तान आपको कारोबार के लिए रास्ता देगा, जिसमें बड़ा मुनाफा है, तो ऐसा रास्ता हमें मंजूर नहीं है। भारत के पास कारोबार के और बहुत रास्ते हैं। वह पाकिस्तान के भरोसे नहीं है। वह भविष्य के लिए तैयारी कर रहा है। आज उसके वैज्ञानिकों की प्रतिभा का डंका समूचे संसार में बज रहा है। कौनसा देश है जो कोरोना की भारतीय वैक्सीन नहीं चाहेगा?

भारत के वैज्ञानिकों, चिकित्सा विशेषज्ञों ने कम से कम समय में असरदार वैक्सीन बनाई है। जबकि इस अवधि में पाकिस्तान आतंकवादी तैयार करता रहा है। वह इसी कोशिश में लगा रहा कि किसी तरह तारों के नीचे से, सुरंग खोदकर या अन्य किसी तरीके का इस्तेमाल कर भारत में आतंकवादी भेजे जाएं। ऐसा देश जिसके इतिहास का हर पृष्ठ आतंकवाद, दमन, उत्पीड़न का सामना कर रहे लोगों के खून से लथपथ है, उसका प्रधानमंत्री भारत को शांति की नसीहत कैसे दे सकता है?

इमरान पहले अपने मुल्क का हाल देखें जहां खूंखार आतंकवादी निर्बाध विचरण कर रहे हैं। अगर ये इस ओर आएंगे तो भारतीय सैनिक इनका गोलियों से स्वागत करेंगे। लेकिन जब इन्हें कोई रास्ता नहीं दिखेगा तो देर-सबेर ये आपके ही नागरिकों को मारेंगे। फिर यह कहना कि ‘भारत को पहला कदम उठाना होगा। वे जब तक ऐसा नहीं करेंगे, हम ज्यादा कुछ नहीं कर सकते’ – झूठ की पराकाष्ठा है। भारत ने हर बार पहला कदम उठाया है, जिसके बाद उसे धोखा मिला है।

क्या भारत और धोखा बर्दाश्त करने का जोखिम ले सकता है? कोई भी विवेकशील मनुष्य इसके लिए तैयार नहीं होगा। भारत को पाकिस्तान के ऐसे किसी उपदेश को गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है। हमें मजबूत अर्थव्यवस्था ​के निर्माण पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए ताकि सेना के पास अत्याधुनिक हथियार हों और जो भी आतंकवादी आए, वह बच नहीं पाए।