प्रतीकात्मक चित्र
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लापता तालाब के मामले पर सवाल बरकरार

चेन्नई/दक्षिण भारत। चेन्नई कलेक्टर ने विरुगम्बक्कम इलाके में एक स्थानीय मस्जिद समिति से अरुलमिगु सुंदरा वरदराजा पेरुमल मंदिर को श्रद्धालुओं और सेवादारों के 20 साल के संघर्ष के बाद 10 एकड़ जमीन वापस दिलाई। हालांकि, कलेक्टर ने मंदिर के एक तालाब को पुनः प्राप्त करने के लिए लगभग 2.5 एकड़ जमीन पर कब्जा करने की याचिका का जवाब नहीं दिया।

साल 1997 में, तालाब को उजाड़ दिया गया था, लेकिन कुछ स्वार्थी तत्वों ने तालाब और आसपास की जमीनों पर कब्जा करने की कोशिश की, जो कुल मिलाकर लगभग 14 एकड़ है। यह जमीन मंदिर को सुंगुवर ब्राह्मण समाज द्वारा दान में दी गई थी।

साल 1910 के रिकॉर्ड में, इन जमीनों को तालुक बोर्ड के नियंत्रण में दिखाया गया था। समय के साथ, उस जमीन को छोड़कर जहां तालाब मौजूद था, बाकी पर स्वार्थी तत्वों द्वारा अतिक्रमण कर लिया गया।

स्थानीय मस्जिद समिति, जिसने वहां इबादत स्थल की योजना बनाई थी, उनमें से थी जिन्होंने इसके नाम पर अवैध रूप से कब्ज़ा की गई तीन एकड़ भूमि को सफलतापूर्वक पंजीकृत करा लिया था। उसने सरकारी कर्मचारियों से मिलकर पंजीकरण प्रक्रिया पूरी करवा ली।

जब स्थानीय हिंदू मुन्नानी को इसके बारे में पता चला, तो उसने इसके खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया। मंदिर उपासक एवं सोसाइटी के अध्यक्ष टीआर रमेश ने पंजीकरण के खिलाफ एक जनहित याचिका दायर की। मद्रास उच्च न्यायालय ने उनके तर्क को स्वीकार किया और पंजीकरण रद्द कर दिया।

उसने चेन्नई कलेक्टर से इस मामले की जांच करने के लिए कहा। सर्वोच्च न्यायालय ने भी उच्च न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा। हालांकि, जब कलेक्टर ने इस विवाद से जुड़े पक्षों को सुनवाई के लिए बुलाया, तो मस्जिद समिति के प्रतिनिधि नहीं आए। इसके मद्देनजर दो साल बाद भी जांच पूरी नहीं हो सकी।

इसके बाद मंदिर सेवादार जेबामणि मोहनराज तालाब को पुनः प्राप्त करने के लिए उच्च न्यायालय चले गए। अपनी याचिका में उन्होंने तालाब की वापसी के लिए तर्क दिए।

संयोग से, इस मामले की सुनवाई उन्हीं न्यायाधीश द्वारा की गई जिन्होंने चेन्नई कलेक्टर से मंदिर भूमि के मुद्दे की जांच करने के लिए कहा था। न्यायाधीश ने कलेक्टर को तुरंत जांच पूरी करने और यह पता लगाने के लिए कहा कि क्या कोई तालाब वहां मौजूद है। न्यायाधीश का आदेश राज्य सरकार द्वारा मामले में नियमित स्थगन की मांग के बावजूद आया।

इसके बाद, कलेक्टर ने मामले की त्वरित जांच शुरू की और वक्फ बोर्ड के प्रतिनिधियों ने सुनवाई में भाग लिया। मस्जिद समिति के प्रतिनिधियों को छोड़कर, जांच में भाग लेने वाले बाकी लोगों ने मंदिर के तालाब की पुनः प्राप्ति की मांग की।

मामले से जुड़े सभी लोगों की सुनवाई के बाद, कलेक्टर ने अंतिम सुनवाई के लिए एक तारीख तय की। लेकिन अंतिम सुनवाई के तीन दिन पहले, कलेक्टर का तबादला कर दिया गया। इसके बाद के दो हफ्तों में, मामले से जुड़े सभी सरकारी कर्मचारियों का तबादला कर दिया गया।

जैसे-जैसे मामला आगे बढ़ा, मोहनराज ने मद्रास उच्च न्यायालय में अदालत की अवमानना का मामला दायर किया। जब अदालत अवमानना मामले की सुनवाई करने वाली थी, तब कलेक्टर की जांच फिर से शुरू हुई। जब अवमानना याचिका को सुनवाई के लिए लिया गया, तो कलेक्टर ने अदालत से कहा कि 10 दिन में फैसला दिया जाएगा।

हालांकि, कोरोना महामारी के कारण विभिन्न विभागों का कामकाज प्रभावित होने से फैसला दो महीने बाद आया। फैसले में, चेन्नई कलेक्टर ने वक्फ बोर्ड की दलीलों को खारिज कर दिया और तालुक बोर्ड को जमीन बहाल कर दी। ध्यान देने वाली बात यह है कि जमीन मंदिर अथवा जिस समाज ने उसे दान में दिया, उसे नहीं लौटाई गई।

लेकिन कलेक्टर के फैसले को मंदिर के स्वामित्व को बनाए रखने के रूप में देखा जा रहा है। यद्यपि कलेक्टर ने जांच के दौरान उल्लेख किया है कि हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्त विभाग और मंदिर अधिकारियों ने तालाब के अस्तित्व का उल्लेख किया था। लेकिन उस पर कोई फैसला नहीं दिया गया।

मोहनराज के अनुसार, फैसले में यह सुनिश्चित किया गया है कि मंदिर की जमीन मस्जिद समिति या भूमाफिया द्वारा नहीं दबाई गई थी। लेकिन लापता मंदिर तालाब पर कोई फैसला नहीं किया गया है। उन्होंने अब इस मुद्दे पर फिर से मद्रास उच्च न्यायालय में याचिका लगाई है।