चुनाव दर चुनाव हो रही हार, अब आत्मचिंतन करे कांग्रेस

फोटो स्रोत: कांग्रेस का फेसबुक पेज।
फोटो स्रोत: कांग्रेस का फेसबुक पेज।

साल 2013 के उत्तरार्द्ध से लेकर अब तक हुए चुनावों में कांग्रेस के लिए खुशी से ज्यादा ग़म के मौके हैं। कभी देश पर एकछत्र राज करने वाली इस पार्टी का जनाधार खिसकता जा रहा है। पार्टी नेतृत्व को इस पर आत्मचिंतन करना चाहिए कि आखिर देश का आम नागरिक धीरे-धीरे उससे दूर क्यों होता जा रहा है? पुड्डुचेरी में कांग्रेस की सरकार भरभराकर गिर गई। अब गुजरात के नगर निगम चुनावों ने आईना दिखा दिया। किसी भी निगम में कांग्रेस का प्रदर्शन यह साबित नहीं करता कि गुजरात में सत्ताविरोधी लहर है और राज्य सरकार के खिलाफ लोगों ने अपना गुस्सा कांग्रेस को वोट देकर निकाला है।

सूरत, राजकोट, जामनगर और भावनगर में कांग्रेस की करारी हार यह संकेत देती है कि उसका नेतृत्व विचार करे कि वह जनता की नब्ज समझने में कहां गलती कर रहा है ? अहमदाबाद में भी कांग्रेस का प्रदर्शन उत्साहवर्द्धक नहीं रहा। बाकी कसर आम आदमी पार्टी (आप) ने पूरी कर दी। यह पार्टी सूरत नगर निगम चुनाव में उतरी और आते ही सबसे पहला वार कांग्रेस की जड़ों पर किया। जो मतदाता परंपरागत रूप से कांग्रेस को वोट देते आए थे, इस बार उन्होंने ‘आप’ को वरीयता दी। इसका सीधा नुकसान कांग्रेस को हुआ। असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम ने भी मुस्लिम बहुल सीटों पर कांग्रेस की नींव हिलाने की कोशिश की है। ऐसे में कांग्रेस को यह विचार अवश्य करना चाहिए कि वह कौनसी वजह है जो जनता को उसके वादे पर भरोसा नहीं करने देती?

गुजरात में भाजपा लंबे समय से सत्ता में है। केशुभाई पटेल के बाद मुख्यमंत्री बने नरेंद्र मोदी को दिल्ली पहुंचने से रोकने के लिए कांग्रेस ने खूब दांव चले, पर सभी नाकाम हुए। दूसरी बार चुनावी अखाड़े में फिर दो-दो हाथ किए, तो जनता ने मोदी की झोली में और ज्यादा सीटें दे दीं। कुछ फैसलों को छोड़ दें तो नरेंद्र मोदी ने प्राय: ऐसे फैसले ज्यादा लिए हैं जिन्हें राजनीति के पंडित अलोकप्रिय और कुर्सी के लिए हानिकारक मानते हैं। फिर चाहे वह नोटबंदी हो, जीएसटी या कोरोना महामारी में देशव्यापी लॉकडाउन। इनके बावजूद जनता मोदी पर भरोसा जता रही है।

मोदी-शाह पर कांग्रेस की ओर से निजी हमले होते रहे हैं, जिनका जवाब ये दोनों नेता अपने अंदाज में देते या नहीं भी देते हैं। सर्जिकल स्ट्राइक, एयर स्ट्राइक, तीन तलाक उन्मूलन, अनुच्छेद 370 निष्प्रभावीकरण, सीएए जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण फैसलों पर कांग्रेस की जो प्रतिक्रिया रही, उसे जनता ने प्रशंसनीय नहीं माना। पिछले साल गलवान घाटी में खूनी भिड़ंत और चीन के साथ एलएसी पर जारी तनाव के बीच जहां देशवासी इस पड़ोसी मुल्क के खिलाफ एकजुट होकर मोदी के ‘वोकल फॉर लोकल’ आह्वान पर भरोसा जता रहे थे, चीनी ऐप पर पाबंदी का स्वागत कर रहे थे, उस समय कांग्रेस की प्रतिक्रिया में वे शब्द नहीं थे जिनकी देशवासी उम्मीद कर रहे थे। कांग्रेस से ज्यादा परिपक्वता की आशा की जा रही थी, जो यह पार्टी नहीं दिखा पाई।

अब कांग्रेस की राजस्थान, पंजाब और छत्तीसगढ़ में सरकार है। वह महाराष्ट्र और झारखंड में सहयोगियों के साथ गठबंधन सरकार चला रही है। राजस्थान में उसकी सरकार बाल-बाल बची है। अभी बंगाल का रण बाकी है, जहां भाजपा पूरा जोर लगा रही है। असम, केरल, तमिलनाडु जैसे राज्यों में पार्टी की साख दांव पर रहेगी। इसी क्रम में अन्य राज्यों में विधानसभा चुनाव आते जाएंगे। फिर 2024 का महामुकाबला ज्यादा दूर नहीं होगा। कांग्रेस रचनात्मक भूमिका निभाते हुए खुद को संभाले। विरोध के लिए विरोध की राजनीति क्षणिक लाभ तो दे सकती है, जनाधार नहीं बढ़ा सकती।