पीछे हट रही पीएलए, निकल गई ड्रैगन के हौवे की हवा

दक्षिण भारत राष्ट्रमत में प्रकाशित संपादकीय
दक्षिण भारत राष्ट्रमत में प्रकाशित संपादकीय

पूर्वी लद्दाख में पैंगोंग झील के उत्तरी और दक्षिणी किनारों से भारत और चीन की सेनाओं को पीछे हटाए जाने के संबंध में दोनों देशों के बीच सहमति बनना न केवल इस क्षेत्र के लिए, बल्कि विश्वशांति के लिए जरूरी है। अब देखना यह है कि चीन का क्या रुख होगा। वह अपने वचनों पर कायम रहेगा या पूर्व की तरह धोखेबाज प्रवृत्ति का परिचय देगा। जब भारत कोई वचन देता है तो उसे निभाता भी है। जबकि चीन का रवैया सदा ही अनिश्चितता से भरा होता है।

अड़ियल ड्रैगन को अब इतना तो समझ में आ गया होगा कि यह भारत और भारत की सेना है, यहां उसकी धमकियां काम नहीं करेंगी। चाहे डोकलाम रहा हो या पैंगोंग, चीन की गीदड़भभकियां हमने खूब सुनीं लेकिन भारत सरकार और सेना का रुख दृढ़ बना रहा। चीन की बौखलाहट पिछले साल गलवान में दिखाई दी जब संख्याबल में पांच गुना ज्यादा पीएलए के जवानों ने भारतीय सैनिकों पर अचानक हमला बोल दिया था। भारत के 20 सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए पर चीन को जोरदार तमाचा पड़ा। उसके तीन दर्जन से ज्यादा जवान ढेर हो गए थे।

भारतीय सेना ने दिखा दिया कि चीन की उद्दंडता का वह अच्छी तरह से उपचार कर सकती है। कोरोना फैलाने के कारण दुनियाभर में हो रही फजीहत और आंतरिक चुनौतियों से जूझ रहे चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने जनता का ध्यान बंटाने के लिए पूर्वी लद्दाख में विवाद का पांसा फेंका, टैंक और भारी हथियार तैनात किए गए, लड़ाकू विमान उड़ाए। इन हथकंडों से चीन मनोवैज्ञानिक दबाव डालना चाहता था। वह 1967 में ऐसा कर चुका है, तब उसे मुंह की खानी पड़ी थी। अब उसने विवाद को बढ़ावा दिया तो भारत ने दृढ़ता से उसी भाषा में जवाब दिया। भारतीय सेना पीएलए की आंखों में आंखें डालकर खड़ी रही। उधर, पूरी दुनिया इस पर नजर बनाए हुए थी।

चीनी सरकार के मुखपत्र बीच-बीच में भड़काऊ टिप्पणी कर भारत को उकसाने में जुटे थे लेकिन इन सबके बीच भारत सरकार और सेना ने संयम व दृढ़ता से काम लिया। अब जबकि चीन अपनी सेना पीछे हटाने के लिए सहमत हो गया है तो उसे इस बात पर जरूर विचार करना चाहिए कि इन तमाम गतिविधियों से क्या प्राप्त हुआ। कुछ नहीं! भारत ने उसके हौवे की हवा निकाल दी। अब तक चीन अपने विभिन्न पड़ोसी देशों के साथ बेवजह झगड़े मोल लेता रहा था। वे उसके दबाव में आ भी जाते थे।

चीन ने सोचा होगा कि यही नुस्खा भारत के साथ काम कर जाएगा, लेकिन यहां मामला उलटा पड़ गया। अब भारत के लिए जरूरी है कि वह अपना रुख इसी भांति दृढ़ रखे। चीन का पुख्ता इलाज करने के लिए हमें कई मोर्चों पर खुद को मजबूत करना होगा। इसके लिए सेना के पास आधुनिक साजो-सामान होना बहुत जरूरी है। साथ ही देश को आर्थिक रूप से मजबूत होना होगा। चीन की सबसे बड़ी ताकत सेना नहीं, उसका खजाना है। वह पिछले 30 वर्षों में बहुत समृद्ध हुआ है। उसका विदेशी मुद्रा भंडार भारत के विदेशी मुद्रा भंडार से बहुत ज्यादा है।

उसकी अर्थव्यवस्था का आकार बहुत बड़ा है। जहां तक चीन की सेना से मुकाबले का सवाल है, भारत की सेनाएं इसमें सक्षम हैं। अब जरूरी है कि आम नागरिक इस लड़ाई में पूरा योगदान दे। गलवान की घटना के बाद चीनी माल के बहिष्कार की जो मुहिम शुरू हुई थी, वह कमजोर नहीं पड़नी चाहिए। यह भी ध्यान रखें कि सिर्फ बहिष्कार से काम नहीं चलने वाला है। हमें अपने उद्योगों को मजबूत करना होगा, नागरिकों के लिए ज्यादा से ज्यादा रोजगार के अवसरों का सृजन करना होगा।

आज वातावरण पूरी तरह भारत के पक्ष में है। कोरोना वायरस के कारण चीन की साख को जबरदस्त बट्टा लगा है। वहीं, भारत ने वैक्सीन निर्माण कर यह सिद्ध कर दिया है कि वह कितना सक्षम, प्रतिभा संपन्न और विश्व कल्याण का समर्थक है। देश में इंटरनेट आदि विभिन्न तकनीकों का विस्तार हो रहा है। ऐसे में सरकार सहित समस्त देशवासियों का यह मिशन होना चाहिए कि भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत हो, देश में समृद्धि आए, अभाव दूर हों। यह सुनिश्ति करना होगा कि जहां तक संभव हो, देश की कमाई का एक रुपया भी चीन के पास न जाए। तभी भारत महाशक्ति के रूप में उस स्थान को प्राप्त करेगा जिसका वह हकदार है। भारत का शक्तिशाली होना चीनी नेतृत्व की सद्बुद्धि के लिए बहुत जरूरी है।