आशा का उगता सूरज

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केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से दी गई यह जानकारी एक बड़ी राहत देने वाली है कि कोरोना के एक्टिव केस के मुकाबले संक्रमण से मुक्त हो चुके लोगों की संख्या अधिक दर्ज की गई है। ऐसा पहली बार हुआ है और इसका मतलब साफ है कि कोरोना मरीजों के ठीक होने की दर 50 प्रतिशत से ज्यादा हो गई है। यह अच्छी खबर इस आशा का संचार करने वाली भी है कि हम कोरोना के खिलाफ लड़ी जा रही जंग को जीतने में कामयाब होंगे। कामयाबी पाने के अलावा और कोई उपाय भी नहीं है। इस कठिन लड़ाई को हर हाल में जीतना ही होगा। कोशिश यह होनी चाहिए कि इस लड़ाई को जल्द से जल्द जीतने में सफलता मिले।
इस सफलता के लिए केंद्र और राज्य सरकारों के साथ-साथ उनकी विभिन्न एजेंसियों को तो लगातार सजगता का परिचय देना ही होगा, इसके साथ ही आम जनता को भी सावधानी बरतनी होगी। निश्र्चित रूप से कोरोना के कहर से डरने की जरूरत नहीं, लेकिन इसका यह भी मतलब नहीं कि उन जरूरी उपायों की अनदेखी की जाने लगे जो संक्रमण से बचे रहने अथवा उसके प्रसार को रोकने में सहायक हैं।
कोरोना से संक्रमित लोगों की तुलना में संक्रमण से छुटकारा पा चुके लोगों की अधिक संख्या के आधार पर इस नतीजे पर नहीं पहुंचा जाना चाहिए कि खतरा टल गया है। इससे इन्कार नहीं कि कोरोना का संक्रमण अभी जारी है और कुछ शहरों में संक्रमण की रफ्तार चिंताजनक है, लेकिन यह अत्यंत उल्लेखनीय है कि अपने देश में मरने वालों की संख्या बहुत कम है। बड़ी आबादी के साथ जनसंख्या के घनत्व और कमजोर स्वास्थ्य ढांचे के बावजूद यदि अन्य देशों के मुकाबले भारत में कोरोना का शिकार बने लोगों की संख्या कहीं कम है, तो इसका मतलब है कि या तो जलवायु ने भारत की मदद की अथवा यहां के लोगों की जीवनशैली ने या फिर उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता ने।
नि:संदेह यह मानने के भी पर्याप्त कारण हैं कि समय रहते लॉकडाउन ने भी अनुकूल परिणाम दिए। जैसे लोगों की जान बचाने के लिए लॉकडाउन जरूरी था, वैसे ही जीविका के साधनों को बल देने के लिए उससे निकलने की प्रक्रिया शुरू करना भी। चूंकि यह प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, इसलिए सभी को अपने-अपने स्तर पर यह सुनिश्र्चित करना चाहिए कि आर्थिक-व्यापारिक गतिविधियां तेजी के साथ आगे बढ़ें। यह सुनिश्र्चित करने का यह अर्थ नहीं है कि यह मान लिया जाए कि अब कोरोना को लेकर सावधान रहने की जरूरत नहीं। जब यह दिख रहा है कि कोरोना से आसानी से छुटकारा मिलने वाला नहीं, तब समझदारी इसी में है कि उससे बचने के तौर-तरीकों को जीवन का हिस्सा बना लिया जाए। इससे कोरोना से बचाव भी होगा और अनावश्यक संक्रमण से भी बचा जा सकेगा। संकट के इस घड़ी में यही आशा की किरण है।