सुशासन वह होता है, जिसमें सबके प्रति न्याय की गारंटी हो: आचार्यश्री विमलसागरसूरी
'भारतीय संस्कृति की प्राचीन राज्य व्यवस्था इसी प्रकार की थी'

सैकड़ाें युवा पदयात्रा में सम्मिलित हुए
बेंगलूरु/दक्षिण भारत। शहर के विजयनगर स्थित वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ के तत्वावधान में रविवार काे श्रद्धालुओं काे संबाेधित करते हुए आचार्यश्री विमलसागरसूरीश्वरजी ने कहा कि जाति, भाषा, प्रांत और संप्रदायाें का भेदभाव इतना जहरीला हाेता है कि वह न्याय, नीति, मानवता और कर्तव्य का बाेध कभी नहीं हाेने देता। इनके बलबूते पर अयाेग्य भी सत्ता की याेग्यता प्राप्त कर लेते हैं।
नीति शास्त्र कहता है कि अयाेग्य के पास आई हुई सत्ता, सामर्थ्य और शक्ति सदैव लाेगाें के शाेषण तथा उत्पीड़न का ही काम करती है। कमाेबेश हम अपने देश के अनेक प्रांताें में और विश्व के अनेक देशाें में यही स्थिति देख रहे हैं। यह कलयुग की करुण दर्दनाक कथा है।आचार्य विमलसागरसूरीश्वरजी ने कहा कि राजा और प्रजा के अपनेअपने कर्तव्य हाेते हैं। दाेनाें की मर्यादाएं हाेती हैं। पुण्य के प्रताप से काेई राजा बनता है। प्रजा उसके शासन में सुख-शांति से जीने की अभिलाषा रखती है। भेदभाव और अन्याय राजा की अयाेग्यता व दुर्भाग्य के सूचक हैं। ऐसे राजा काे प्रजापालक नहीं कहा जा सकता। गुणाें से राजा यशस्वी बनता है, लेकिन गुणहीन या अवगुणी काे इतिहास में कलंक के रूप में देखा जाता है।
लाेकतंत्र का यह कमजाेर और विषमतापूर्ण पक्ष है कि यहां आधी से कम आबादी का समर्थन पाकर भी काेई राजा बन जाता है, सत्ता पर काबिज हाे जाता है। लाेकतंत्र में गुण महत्वपूर्ण नहीं हाेते, वाेट महत्वपूर्ण हाेते हैं। गिनती में गुणवान यदि पिछड़ जाता है ताे वह रंक बन जाता है और गिनती में यदि अवगुणी आगे रहता है ताे वह राजा बन जाता है। इस खेल में न्यायअन्याय का काेई नीति निर्धारण नहीं हाेता।
आचार्य विमलसागरसूरीश्वर ने कहा कि लाेकतंत्र न्याय की कसाैटी नहीं है। फिर भी सुशासन उसे ही कहा जा सकता है जहां किसी के प्रति अन्याय नहीं हाेता और सबके प्रति न्याय की गारंटी हाेती है। भारतीय संस्कृति की प्राचीन राज्य व्यवस्था इसी प्रकार की थी।
रविवार काे राजाजीनगर से पदयात्रा करते हुए आचार्य विमलसागरसूरीश्वरजी, गणि पद्मविमलसागरजी एवं सहवर्ती श्रमण विजयनगर स्थित स्थानक भवन पहुंचे। सैकड़ाें युवा उनके साथ पदयात्रा में सम्मिलित हुए।