समाज की मजबूती में सुरक्षित भविष्य
समाज मजबूत रहेगा, तो ही अन्य चीजों का महत्त्व रहेगा

अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाना बहुत जरूरी है
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने बांग्लादेश में कट्टरपंथी तत्त्वों द्वारा हिंदू और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ हिंसा और उत्पीड़न का मुद्दा पुरजोर ढंग से उठाया है। जब से इस पड़ोसी देश में सत्ता परिवर्तन हुआ है, वहां अल्पसंख्यकों का जीना मुहाल हो गया है। शुरुआत में ज़्यादातर देशों और वरिष्ठ नेताओं ने संपूर्ण घटनाक्रम पर चुप्पी साधे रखी, लेकिन जब सोशल मीडिया ने पूरा सच खोलकर सामने रख दिया तो हिंसा के विरोध में जगह-जगह से आवाजें उठने लगीं। बांग्लादेश में हिंदुओं समेत सभी अल्पसंख्यकों में बड़ी तादाद उन लोगों की है, जो ग़रीब हैं। उन पर पहले भी बहुत अत्याचार हुए हैं। उन्हें अपनी सुरक्षा को लेकर सबसे ज्यादा उम्मीदें भारत से हैं। यहां नेताओं का एक वर्ग वोटबैंक की राजनीति के कारण बांग्लादेश में बवाल और उत्पीड़न पर खामोश रहा था। उसे सोशल मीडिया पर चौतरफा आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था। जब देखा कि अब खामोश रहना ठीक नहीं है तो बयान देने शुरू कर दिए, लेकिन उनके साथ कुछ शब्द इतनी सफाई से जोड़ दिए, ताकि अपनी बात कह दी जाए और सियासी नुकसान भी न हो। 'बैलेंस' बनाकर चलने के अपने फायदे हैं! हां, भारत में कई संगठनों ने रैलियां निकालीं, बांग्लादेशी हिंदुओं की रक्षा के लिए खुलकर आवाज उठाई। अमेरिका में भी प्रदर्शन हुए। वहां संगठनों के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं ने खुलकर कहा कि बांग्लादेशी हिंदुओं का जीवन मायने रखता है, उनकी रक्षा होनी चाहिए। इसी क्रम में अब आरएसएस के शीर्ष निर्णायक मंडल अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा (एबीपीएस) की बैठक में बांग्लादेश के संबंध में प्रस्ताव पारित किया जाना स्वागत-योग्य है।
आरएसएस ने स्पष्ट कहा है कि बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार मानवाधिकारों के उल्लंघन का गंभीर मामला है। वहां मठों, मंदिरों, दुर्गापूजा पंडालों और शैक्षणिक संस्थानों पर हमले बढ़े हैं, देव प्रतिमाओं का अपमान हुआ है। यही नहीं, हत्याओं, संपत्तियों की लूट, महिलाओं के अपहरण आदि की घटनाएं भी सामने आई हैं। सोचिए, कभी जिस भूमि पर 'वंदे मातरम्' गूंजता था, जहां से निकली राष्ट्रवाद की लहर ने पूरे भारत में चेतना का प्रसार कर दिया था, वहां ऐसे हालात क्यों पैदा हो गए? आज जिसे 'बांग्लादेश' कहा जाता है, वहां हमारे कई तीर्थस्थल हैं। इस देश को आज़ाद करवाने के लिए हमारे सैनिकों ने अपना लहू दिया था। आज वहां कट्टरपंथियों ने हाहाकार मचा रखा है। बांग्लादेश को देखकर समझ आता है कि पैसा, प्रतिष्ठा, पदवी, प्रशंसा अपनी जगह हैं, इनके साथ-साथ समाज का मजबूत होना बहुत जरूरी है। बांग्लादेश में रहने वाले ऐसे हिंदू जो करोड़ों-अरबों रुपए की संपत्ति के मालिक हैं, जिनके बड़े-बड़े बंगले हैं, जिन्होंने बेशकीमती पर्दे लगा रखे हैं, खूबसूरत कालीन बिछा रखे हैं, जो महंगी कारों में बैठते हैं, जिन्होंने बड़ी-बड़ी डिग्रियां ले रखी हैं, जिनकी प्रशंसाओं पर आधारित कई लेख छप चुके हैं, जिनके सोशल मीडिया पर बड़े चर्चे हैं ... आज वे कितने सुरक्षित हैं? अगर समाज मजबूत रहेगा, तो ही अन्य चीजों का महत्त्व रहेगा। बांग्लादेश में ऐसी कई हवेलियां देखने को मिलेंगी, जिनमें धनवान हिंदू पीढ़ियों से रह रहे थे, लेकिन देशविभाजन के बाद उन्हें रातोंरात सबकुछ छोड़कर जाना पड़ा। जो एक रात पहले मुलायम गद्दों पर सो रहे थे, उन्हें बाद में कई साल जमीन पर सोना पड़ा। जिनकी बही में हजारों-लाखों रुपए के हिसाब थे, वे एक ही झटके में डूब गए। 'मुझे क्या ... मेरा क्या ... मुझे राजनीतिक व्यवस्था से क्या मतलब ...', जैसी सोच खतरनाक है। समाज को एकजुट रखते हुए निरंतर सुधार की प्रक्रिया के साथ उसे मजबूत करते जाना और स्वस्थ व्यवस्थाओं को अपनाने में अग्रणी रहकर अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाना बहुत जरूरी है। यह काम आपके लिए कोई और नहीं करेगा। खुद को ही करना होगा।About The Author
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